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ऐक्सिस बैंक की स्‍टडी में पता चला कि विकसित भारत के लिए ज्‍यादा से ज्‍यादा महिलाओं को पेड वर्क में लाना होगा

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krishna kant

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ऐक्सिस बैंक की स्‍टडी में पता चला कि विकसित भारत के लिए ज्‍यादा से ज्‍यादा महिलाओं को पेड वर्क में लाना होगा

मुंबई: भारत में बच्चों के जन्म लेने की दर (फर्टिलिटी) कम हो रही है, जिसका मतलब है कि देश की आबादी तेजी से बुढ़ापे की ओर बढ़ रही है। ऐक्सिस बैंक की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास अमीर बनने के लिए अब बहुत कम समय बचा है। अगर हमें देश को बूढ़ा होने से पहले आर्थिक रूप से मज़बूत बनाना है, तो ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं का अच्छी नौकरियों और प्रोफेशनल काम से जुड़ना बहुत ज़रूरी है।

“द मिसिंग हाफ: वुमेन एंड इंडिया’ज़ ग्रोथ चैलेंज” नामक इस रिपोर्ट में वैश्विक प्रमाणों, भारतीय डेटा के गहन विश्लेषण और 42 भारतीय शहरों में लगभग 11,000 कॉलेज-शिक्षित महिलाओं के प्रॉपरायटरी सर्वे पर आधारित है।

रिपोर्ट का तर्क है कि 2050 तक ‘विकसित भारत’ का सपना हासिल करने के लिए आवश्यक लगभग 7% की विकास दर को 25 वर्षों तक बनाए रखने के लिए, कुल श्रमिक भागीदारी (वेतनभोगी कार्य में) को वर्तमान लगभग 47% से बढ़ाकर करीब 60% करना होगा। इस लक्ष्य को हासिल करने में महिलाओं की वेतनभोगी कार्य (पेड़ वर्क) में भागीदारी बेहद निर्णायक होगी।

एक महत्‍वपूर्ण  चुनौती

हालांकि, वर्तमान में भारत में G20 अर्थव्यवस्थाओं में वेतनभोगी कार्य में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर सबसे कम में से एक है। इसके अलावा, रोजगार प्राप्त महिलाएं ज्यादातर कृषि, स्व-रोजगार या अवैतनिक कार्य में लगी हुई हैं।

  • वेतनभोगी कार्य में लगी महिलाओं में से लगभग 60% अनौपचारिक व्यवस्थाओं में हैं, जहां कोई अनुबंध या सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं है। महिलाओं के 61% श्रमिक कृषि में संलग्न हैं।
  • 125 मिलियन शिक्षित महिलाएं कार्यबल से बाहर हैं, और स्नातक स्तर की 60% महिलाएं वेतनभोगी कार्य से बाहर रहना चुनती हैं।
  • अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में शादी के बाद महिलाओं की कार्यबल भागीदारी में लगभग 20% की कमी आती है।
  • प्रसव के बाद भागीदारी और भी गिर जाती है। यह वैश्विक चुनौती है: उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में भी प्रसव के बाद माताओं की रोजगार दर लगभग 25% गिर जाती है, और उनकी कमाई 33% तक कम हो जाती है।
  • सर्वेक्षण में शामिल 61% महिलाओं ने कार्यबल में प्रवेश की सबसे बड़ी बाधा के रूप में सुरक्षा और मोबिलिटी को बताया।

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब उस स्थिति से बाहर निकल रहा है जहाँ कम आय के कारण महिलाओं का कामकाजी होना मुश्किल था, लेकिन देश के बड़े लक्ष्यों को देखते हुए यह सुधार अभी भी काफी धीमा है। अच्छी बात यह है कि घरों में बिजली, साफ पानी और गैस जैसी सुविधाओं के आने से महिलाओं के घरेलू कामों का बोझ कम हुआ है। साथ ही, अब ज़्यादा लड़कियाँ उच्च शिक्षा ले रही हैं, जिससे शादी के बाद करियर छूट जाने या "मैरिज पेनल्टी" (शादी का नुकसान) का असर भी धीरे-धीरे कम हो रहा है।

मुख्य मांग-पक्ष की बाधाएं बनी हुई हैं

हालांकि, महिलाओं के लिए घर के पास खेती के अलावा अन्य काम मिलना अब भी काफी मुश्किल है। भारत में अच्छी नौकरियों की कमी एक बड़ी चुनौती है, जिसे पुरुषों में कम गुणवत्ता वाले 'सेल्फ-रोजगार' और अस्थायी कामों के रूप में देखा जा सकता है। सामाजिक नियमों के कारण महिलाओं पर इस तरह के दिखावे वाले रोजगार में लगे रहने का दबाव नहीं होता, जिससे काम में उनकी भागीदारी बढ़ाने वाले बदलावों की रफ्तार धीमी हो जाती है। इसके साथ ही, सुरक्षा, आने-जाने की सुविधा, बच्चों की देखभाल और लचीले कामकाजी घंटों की कमी उन्हें पीछे खींचती है। साथ ही, भारत में उन क्षेत्रों (जैसे गारमेंट या इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली) की भी कमी है, जहाँ दुनिया भर में बड़े पैमाने पर महिलाओं को रोजगार मिलता है।

वैश्विक सबक और आज के समय में महत्‍व

रिपोर्ट में बताया गया है कि अन्य देशों ने इन चुनौतियों को कैसे दूर किया, इसके लिए अमेरिका के पिछले सौ सालों के बदलावों का अध्ययन किया गया है। वहाँ महिलाएं घर की चारदीवारी से निकलकर अर्थव्यवस्था के मुख्य केंद्र में आ गईं। यह बड़ा बदलाव बेहतर शिक्षा, अर्थव्यवस्था के नए स्वरूप, नई तकनीक, कानूनी सुधारों और परिवार नियोजन की आज़ादी जैसे कारणों से मुमकिन हो पाया। इसके साथ ही, सामाजिक सोच में भी बदलाव आया और महिलाओं ने खुद भी काम को केवल एक 'नौकरी' की बजाय अपने 'करियर' और पहचान के रूप में देखना शुरू किया।

आजकल शुरुआती स्तर पर महिलाओं और पुरुषों की तनख्वाह में शादी या भेदभाव के कारण होने वाला अंतर लगभग खत्म हो चुका है, लेकिन 'मदरहुड पेनल्टी' (माँ बनने का नुकसान) अब भी एक बड़ी चुनौती है। करियर की शुरुआत में तो समानता रहती है, लेकिन बच्चा होने के बाद महिलाओं के लिए मुश्किलें और असमानता बढ़ जाती है। ऐसी नौकरियां जहाँ बहुत ज़्यादा और कड़े घंटों तक काम करना पड़ता है, वहाँ छोटे से ब्रेक के बाद वापसी करना काफी नुकसानदेह साबित होता है। यही वजह है कि जब महिलाओं पर करियर या बच्चों में से किसी एक को चुनने का दबाव बढ़ता है, तो वे बच्चों की संख्या कम रखने का फैसला करती हैं, जिससे देश की प्रजनन दर में गिरावट आ रही है।

अध्ययन में भारत को चेतावनी दी गई है कि जहां अभी भी बड़ा ‘मैरिज पेनल्‍टी’ मौजूद है, साथ ही ‘मदरहुड पेनल्‍टी’ और अन्य पूर्वाग्रह भी हैं, वहां भागीदारी को तेज करने के लिए नौकरी डिजाइन, बाल देखभाल समर्थन और पुनः प्रवेश के रास्तों जैसी चुनौतियों को संबोधित करना होगा।

भारत की कॉलेज-ग्रेजुएट महिलाएं क्या कहती हैं

ऐक्सिस बैंक के प्रॉपरायटरी सर्वे से पता चलता है कि आकांक्षाओं में स्पष्ट बदलाव आ रहा है। अधिकांश महिलाएं अब वेतनभोगी कार्य को करियर के रूप में देखती हैं और इसे अपनी पहचान का हिस्सा मानती हैं। वे जीवन को “करियर और परिवार” दोनों के इर्द-गिर्द बनाना चाहती हैं, न कि एक को दूसरे पर तरजीह देकर।

फिर भी, शादी, देखभाल की जिम्मेदारियां, कार्यस्थल की संरचना और सामाजिक अपेक्षाएं अभी भी प्रभावित करती हैं कि महिलाएं कार्य में कैसे प्रवेश करती हैं, आगे बढ़ती हैं और वापस लौटती हैं। ब्रेक के बाद री एंट्री करना विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। महिलाओं ने कठोर भर्ती मानदंडों, कौशल की हानि, उम्र के आधार पर भेदभाव और सीमित लचीली भूमिकाओं को प्रमुख बाधाएं बताया है।

संरचनात्मक समर्थन—जैसे चाइल्‍डकेयर, काम के लचीले विकल्प, सुरक्षित आवागमन और री एंट्री के विश्वसनीय रास्ते—केवल प्रेरणा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

यह सिर्फ सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि विकास की अनिवार्यता है

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत की लंबी अवधि की तरक्की के लिए महिलाओं का कामकाजी होना सबसे जरूरी है। यह केवल समाज सेवा का काम नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की एक बड़ी मजबूरी है। इसके लिए उन क्षेत्रों में नौकरियां बढ़ानी होंगी जहाँ बड़ी संख्या में महिलाएं काम कर सकें। साथ ही, पार्ट-टाइम और अपनी सुविधा के अनुसार काम करने के विकल्पों को आधिकारिक पहचान देनी होगी। बच्चों की देखभाल की सुविधाओं और सुरक्षित सफर के लिए निवेश करना भी ज़रूरी है। इसके अलावा, पुराने पड़ चुके नियमों की बाधाओं को हटाना होगा और कंपनियों के ऊंचे पदों तक महिलाओं को पहुँचाने के लिए मज़बूत रास्ते तैयार करने होंगे।

लॉन्च के बारे में, नीलकंठ मिश्रा, चीफ इकोनॉमिस्‍ट, ऐक्सिस बैंक और हेड, ग्लोबल रिसर्च, ऐक्सिस कैपिटल ने कहा, “जितना कम समय हमारे पास बचा है, हमें ‘सभी हाथों की जरूरत है’। हमने पक्के मकान, बिजली, पाइप्ड पानी और बिजली तक पहुंच के माध्यम से घरेलू उत्पादकता में उल्लेखनीय प्रगति की है। कई राज्यों ने सकल नामांकन अनुपात में लिंग समानता हासिल कर ली है। लेकिन हमें श्रम की मांग बढ़ानी होगी, शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारना होगा, पुरानी कानूनी बाधाओं को हटाना होगा, और चाइल्‍डकेयर सुविधाओं तथा कार्यालयों में लचीलापन लाने पर काम करना होगा ताकि ‘मिसिंग हाफ’ को कार्यबल में लाया जा सके।”

राजकमल वेम्पति, ग्रुप एग्जीक्यूटिव और हेड, ह्यूमन रिसोर्सेस, ऐक्सिस बैंक ने कहा, “भारत की विकास सीमा सीधे उसके ग्लास सीलिंग से जुड़ी हुई है, जहां 125 मिलियन शिक्षित महिलाएं अभी भी किनारे पर खड़ी हैं। अगले दशक का विकास उन संगठनों का होगा जो करियर को तरलता के लिए फिर से डिजाइन करेंगे—महिलाओं को बिना दंड के प्रवेश और वापसी की अनुमति देंगे। महिलाओं की कार्यबल भागीदारी में 22 प्रतिशत अंकों की वृद्धि करना सिर्फ सामाजिक लक्ष्य नहीं है; यह हमारे पास सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक लीवर है।”

पूरी रिपोर्ट के लिए यहां क्लिक करें :  The Missing Half: Women and India’s Growth Challenge

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