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भारत में समावेशी और मानसिक रूप से स्वस्थ कार्यस्थल: नीतियों से परे एक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता

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भारत में समावेशी और मानसिक रूप से स्वस्थ कार्यस्थल: नीतियों से परे एक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता
  • - परमेश शाहानी, DEi लैब्स के प्रमुख, गोदरेज इंडस्ट्रीज और क्वीरिस्तान के लेखक

नई दिल्ली : आधुनिक कॉर्पोरेट जगत में अब 'मानसिक स्वास्थ्य' और 'समावेश' (Inclusion) को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जा रहा है। विशेष रूप से LGBTQIA+ समुदाय के लिए, कार्यस्थल पर कल्याण का अर्थ केवल चिकित्सा लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उनकी पहचान और 'मनोवैज्ञानिक सुरक्षा' से है। प्रगतिशील संगठन अब समझ रहे हैं कि जब एक कर्मचारी अपनी वास्तविक पहचान के साथ काम करने में सक्षम होता है, तभी वह अपनी पूरी रचनात्मक क्षमता का प्रदर्शन कर पाता है।

मनोवैज्ञानिक सुरक्षा: समावेश की नींव क्वीर कर्मचारियों के लिए मानसिक तनाव का एक बड़ा कारण पूर्वाग्रह और भेदभाव का डर होता है। जब संगठन एक ऐसा वातावरण सुनिश्चित करते हैं जहाँ व्यक्तित्व के आधार पर कोई 'जजमेंट' न हो, तो तनाव कम होता है और कार्यक्षमता बढ़ती है।

  • दिखावे से दूर वास्तविक नीतियां: समावेश केवल प्रतीकात्मक अभियानों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे स्वास्थ्य लाभों (जैसे पार्टनर्स को बीमा), जेंडर अफर्मेशन नीतियों और संवेदनशील शिकायत निवारण तंत्र के माध्यम से रोज़मर्रा के व्यवहार में शामिल किया जाना चाहिए।
  • गोपनीयता का सम्मान: संगठनों को कर्मचारियों पर अपनी पहचान उजागर करने का दबाव नहीं डालना चाहिए। सहायता प्रणाली और लाभ सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध होने चाहिए, चाहे कर्मचारी की पहचान सार्वजनिक हो या निजी।

नेतृत्व की भूमिका और 'विकसित भारत 2047' का विज़न 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की दिशा में बढ़ते हुए, एक न्यायसंगत समाज के निर्माण में कॉर्पोरेट लीडरशिप की भूमिका महत्वपूर्ण है। जब नेतृत्व (Leadership) स्वयं संवेदनशीलता दिखाता है और समावेशी पहलों में सक्रिय भाग लेता है, तो संगठन में 'अपनेपन' का भाव प्रबल होता है। यह न केवल विविध प्रतिभाओं को आकर्षित करता है, बल्कि व्यावसायिक परिणामों को भी सशक्त बनाता है।

निष्कर्ष: एक निरंतर प्रक्रिया समावेशी और मानसिक रूप से स्वस्थ कार्यस्थल बनाना कोई 'चेकलिस्ट' की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। इसमें कर्मचारियों की बात सुनना, फीडबैक से सीखना और समय के साथ बदलाव करना अनिवार्य है। अंततः, एक मानवीय तंत्र का विकास ही एक ऐसे भविष्य की ओर ले जाएगा जहाँ हर व्यक्ति निडर होकर योगदान दे सके।

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