दुनियाभर में इन दिनों खाने-पीने की चीज़ों से लेकर खेती-किसानी से जुड़े सामानों के दाम आसमान छू रहे हैं. हालात ऐसे बन चुके हैं कि आम आदमी की रसोई का बजट पूरी तरह से बिगड़ गया है और थाली पर महंगाई की भारी मार पड़ रही है. इस बेतहाशा महंगाई के पीछे कई बड़ी वजहें जिम्मेदार हैं. एक तरफ दुनिया भर में मौसम का मिजाज बदला हुआ है और जलवायु परिवर्तन का असर फसलों पर साफ दिख रहा है, तो दूसरी तरफ लाल सागर और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्तों पर चल रहे भू-राजनीतिक तनाव ने सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है. इन सब वजहों से परिवहन का खर्च और लॉजिस्टिक्स का भारी-भरकम बोझ बढ़ गया है, जिससे हर ज़रूरी चीज़ के दाम लगातार ऊपर जा रहे हैं.
चावल और चीनी क्यों इतने महंगे हो गए हैं?
अगर चावल की बात करें तो इसके दाम पिछले दो साल के सबसे ऊपरी स्तर पर पहुंच चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में चावल के उत्पादन में करीब 2.4 फीसदी की गिरावट आ सकती है. अगर भारत की बात करें तो यहां भी चावल का उत्पादन पिछले साल के 154 मिलियन टन से लुढ़क कर करीब 144 मिलियन टन यानी करीब 6.5 फीसदी कम रहने का अनुमान जताया गया है. ऊपर से सप्लाई टाइट होने और शिपिंग के किराए में भारी उछाल आने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चावल के फ्यूचर्स 30 से 70 फीसदी तक महंगे हो चुके हैं. कंटेनर का किराया जो कभी 5,000 डॉलर हुआ करता था, वह बढ़कर सीधे 55,000 डॉलर के आसपास पहुंच गया है.
चीनी के मोर्चे पर भी आम जनता को कोई राहत मिलती नजर नहीं आ रही है. ब्राजील, भारत, थाईलैंड और यूरोपीय संघ जैसे दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक देशों में खराब मौसम की मार से फसलों को 10 से 20 फीसदी तक का भारी नुकसान हुआ है. आंकड़े बताते हैं कि यूरोपीय संघ में चीनी का उत्पादन 19 फीसदी और थाईलैंड में 17 फीसदी तक कम हो सकता है. अमेरिकी कृषि विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भी चीनी का उत्पादन 14 फीसदी घटकर 29.5 मिलियन टन पर सिमट सकता है. कुल मिलाकर वैश्विक स्तर पर तीन से साढ़े तीन मिलियन टन चीनी की कमी देखने को मिल सकती है, जिसके चलते कीमतें करीब 35 फीसदी तक बढ़ चुकी हैं.
कपास, तेल और दालों के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?
खाने वाले तेलों और बाकी कृषि उत्पादों का हाल भी कुछ ऐसा ही है. क्रूड ऑयल की कीमतों के खेल के कारण अब ग्लोबल वेजिटेबल ऑयल का एक बड़ा हिस्सा बायोफ्यूल यानी ईंधन बनाने में डायवर्ट किया जा रहा है. इसी का नतीजा है कि सोयाबीन और सोयाबीन का तेल 20 से 40 फीसदी तक और रेपसीड ऑयल 23 फीसदी तक महंगा हो गया है.
दूसरी तरफ कपास और रबर जैसी औद्योगिक फसलों का उत्पादन भी घटा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक वैश्विक स्तर पर कपास का उत्पादन घटकर 25.8 मिलियन टन रह गया है, जिसके चलते कपास 25 फीसदी और रबर 44 फीसदी तक महंगा बिक रहा है. दालों की बात करें तो चना 23 फीसदी, उड़द 24 फीसदी और मटर 47 फीसदी तक महंगी हो चुकी है, जिसमें सरकार के आयात शुल्क बढ़ाने का फैसला भी एक बड़ी वजह है. इन सबके अलावा जौ 44 फीसदी, मक्का 9 फीसदी और चाय के दामों में भी 10 फीसदी तक का इजाफा हुआ है.
आम आदमी की जेब पर क्या पड़ रहा असर?
| जिंस या वस्तु | कीमतों में बदलाव और उत्पादन का हाल |
|---|---|
| चावल | दाम दो साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं. वैश्विक स्तर पर उत्पादन 2.4% और भारत में 6.5% कम हुआ है. |
| चीनी | कीमतें 35% तक बढ़ चुकी हैं. दुनिया भर में 3 से 3.5 मिलियन टन चीनी की कमी का अनुमान है. |
| खाद्य तेल | तेल का एक बड़ा हिस्सा बायोफ्यूल में इस्तेमाल होने से सोयाबीन और इसका तेल 20% से 40% तक महंगा हुआ है. |
| दालें | चना 23%, उड़द 24% और मटर 47% तक महंगी हो चुकी हैं. |
| अन्य फसलें | कपास 25%, रबर 44%, जौ 44%, मक्का 9% और चाय 10% तक महंगी हुई है. |
इन तमाम वजहों से दुनिया भर में महंगाई का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बना हुआ है. परिवहन का संकट और फसलों के खराब होने का यह सिलसिला जिस तरह से चल रहा है, उसे देखकर ऐसा ही लगता है कि आम आदमी को फिलहाल महंगाई से राहत मिलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है.









