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मच्छर भगाने वाली गैर कानूनी तरीके से निर्मित अगरबत्तियां डेंगू जितनी ही खतरनाक, डॉक्टरों ने दी चेतावनी

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krishna kant

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मच्छर भगाने वाली गैर कानूनी तरीके से निर्मित अगरबत्तियां डेंगू जितनी ही खतरनाक, डॉक्टरों ने दी चेतावनी

मुंबई: भारत में घरेलू स्तर पर उपयोग किये जाने वाले कीटनाशकों के सुरक्षित इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाली गैर-लाभकारी संस्था, 'होम इन्सेक्ट कंट्रोल एसोसिएशन' (हिका) ने राष्ट्रीय डेंगू दिवस (16 मई) से पहले सार्वजनिक स्वास्थ्य के संबंध में विस्तृत अध्ययन जारी किया है। इसमें कहा गया है कि गैर कानूनी तरीके से बनी मच्छर भगाने वाली नकली अगरबत्तियां, डेंगू और मलेरिया जैसी मच्छर-जनित बीमारियों से भी अधिक खतरनाक हैं, जबकि ऐसी अगरबत्ती का लक्ष्य होता है, इन्हीं बीमारियों को रोकना। 'होम इन्सेक्ट कंट्रोल एसोसिएशन' (हिका) के निर्देश पर, यह शोध बाज़ार अनुसंधान कंपनी 'कंटार' ने किया था। सर्वेक्षण में शामिल 95% परिवारों ने पिछले एक साल में मलेरिया या डेंगू जैसी किसी भी मच्छर से होने वाली बीमारी की शिकायत नहीं की, लेकिन 70% डॉक्टरों का कहना है कि गैर-कानूनी तरीके से उत्पादित मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती को सांस से जुड़ी गंभीर बीमारी पैदा कर सकते है । 67% डॉक्टरों के अनुसार, यह खतरा सिगरेट के धुएं से पैदा होने वाले स्वास्थ्य संबंधी जोखिम के बराबर है। इनमें आम तौर पर खतरनाक रसायन होते हैं जिन्हें उपयोग करने की मंज़ूरी नहीं होती है।

हाल ही में हुए इस सर्वेक्षण में 12 शहर के 1,264 परिवार और पल्मोनोलॉजिस्ट, बाल रोग विशेषज्ञ, जेनरल फिज़िशियन और स्त्री रोग विशेषज्ञ समेत 405 डॉक्टर शामिल हुए। यह सर्वेक्षण देश में बढ़ते ऐसे स्वास्थ्य संकट को उजागर करता है, जो गैर कानूनी तरीके से निर्मित मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती के व्यापक इस्तेमाल के कारण पैदा हो रहा है।

इस समस्या का दायरा काफी बड़ा है। भारत में मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती का बाज़ार लगभग ₹2,000 करोड़ का है, जिसमें से 85% हिस्से पर गैर-कानूनी या अनियमित कंपनियों का कब्ज़ा है। ये ऐसे उत्पाद हैं जिन्हें न सरकार से कोई मंज़ूरी मिली है, न ही उन पर अनिवार्य 'सेंट्रल इन्सेक्टिसाइड्स रजिस्ट्रेशन' (सीआईआर) का लेबल लगा होता है, और न ही उनमें इस्तेमाल की गई सामग्री के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी दी गई होती है। ये उत्पाद आमतौर पर 'कम्फर्ट', 'स्लीपवेल', 'रिलैक्स', 'सन-रिलैक्स', 'शुभानित्रा', 'हंटिंग टाइगर', 'हाई वोल्टेज', 'हैप्पी नाइट', 'डेंगू किलर' और 'हाई-पावर' जैसे नाम से बेचे जाते हैं। अक्सर इनके पास न तो कोई नियामक मंज़ूरी होती है और न ही इनमें इस्तेमाल की गई सामग्री के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी दी गई होती है। इसके बावजूद, 59% भारतीय परिवार ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल करने की बात स्वीकार करते हैं, और इनमें से आधे परिवार तो पिछले तीन साल से भी अधिक समय से, हर रोज़ इन उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

होम इन्सेक्ट कंट्रोल एसोसिएशन (हिका) के सचिव और निदेशक, जयंत देशपांडे ने इस बारे में कहा, “स्थानीय दुकानों और केमिस्ट आउटलेट पर बिकने वाली मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियों में से अधिकतर बगैर परीक्षण दौर से गुज़रे ही बाज़ार में आ जाते हैं, जो गैर-कानूनी है। साथ ही इनमें आवश्यक सीआईआर पंजीकरण नंबर भी नहीं होता। ग्राहकों को ऐसे उत्पाद ढूंढने चाहिए जिन पर सीआरआर रजिस्ट्रेशन नंबर स्पष्ट लिखा हो, और ऐसे उत्पादों से बचना चाहिए जिनमें साफ साफ आवश्यक नियामकीय विवरण न दिया गया हो।”

सर्वेक्षण में शामिल डॉक्टरों ने लंबे समय तक इन अगरबत्तियों के इस्तेमाल से घर में रहने वाले लोगों पर होने वाले असर पर चिंता जताई। 84% डॉक्टरों का मानना ​​है कि गैर-कानूनी तरीके से निर्मित मच्छर अगरबत्तियों के नियमित इस्तेमाल से उन घरों के स्वास्थ्य संबंधी खर्च बढ़ रहे हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि लोगों की सोच में बहुत फर्क है। 48% ग्राहक किसी उत्पाद को सिर्फ इसलिए सुरक्षित मान लेते हैं कि वह किसी केमिस्ट की दुकान पर बिक रहा होता है; 56% डॉक्टर इस सोच को खास तौर पर खतरनाक मानते हैं। इसके अलावा, 50% ग्राहकों का मानना ​​है कि हर्बल या सिट्रोनेला-आधारित अगरबत्तियां सुरक्षित होती हैं, जबकि 66% डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे उत्पादों में गुमराह करने वाले दावे होते हैं, साथ बगैर नियामकीय निगरानी के बने होते हैं, इसलिए और भी अधिक खतरनाक होते हैं।

इस सर्वेक्षण से जागरूकता की कमी उजागर होती है। लगभग 55% डॉक्टरों ने बताया कि परिवारों को सुरक्षित और मंज़ूरी प्राप्त विकल्पों के बारे में जानकारी नहीं है, और वे जोखिम के बावजूद आसानी से उपलब्ध गैर-कानूनी तरीके से निर्मिंत मच्छर अगरबत्तियों पर ही निर्भर रहते हैं।

एस.एल रहेजा हॉस्पिटल, माहिम - फोर्टिस एसोसिएट- के क्रिटिकल केयर निदेशक, डॉ. संजीत ससीधरन ने कंटार की रिपोर्ट से मिली जानकारियों पर अपनी टिप्पणी  में कहा, “डेंगू से बचाव के लिए मच्छर भगाने वाले उत्पाद ज़रूरी हैं, लेकिन हमें इन उत्पादों - जिनमें मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियां भी शामिल हैं - से निकलने वाले धुएं के लगातार संपर्क में आने से बचना चाहिए। समस्या इसलिए पैदा होती है कि बाज़ार में बिकने वाले कुछ मच्छर भगाने वाले उत्पाद ज़रूरी मानकों अनुरूप नहीं होते तो वहीं, कुछ उत्पादों में पाइरेथ्रॉइड, ऑर्गेनोफॉस्फेट, भारी धातु और दूसरे ऐसे कंपाउंड हो सकते हैं जो सांस की नली में परेशानी पैदा कर सकते हैं। इन गैर-कानूनी रूप से निर्मित मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियों से होने वाली सांस की दिक्कत और एलर्जी उन लोगों में ज़्यादा आम होती जा रही हैं जो अपने घरों में इनका नियमित इस्तेमाल करते हैं।

बच्चों, बुज़ुर्गों, अस्थमा के मरीज़ों और सीओपीडी से पीड़ित लोगों को सबसे अधिक खतरा होता है, क्योंकि इससे सांस से जुड़ी परेशानी और बढ़ सकती हैं, और लगातार खांसी, घरघराहट और सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। इसे सस्ता और सुरक्षित उपाय माना जाता है, लेकिन दरअसल लगातार इसके संपर्क में रहने से सेहत के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। सबसे अच्छा यह है कि वे ऐसे मच्छर भगाने वाले उत्पादों का इस्तेमाल करें जो सुरक्षित हों, सरकार से स्वीकृति प्राप्त हों, और जिन्हें घर में इस्तेमाल के लिए किये गए परीक्षण में सुरक्षित पाया गया हो।”

इन निष्कर्षों से स्पष्ट है कि उपभोक्ताओं को जागरूकता के साथ सोच-समझकर फैसला करना चाहिए, साथ ही बगैर नियम-कानून का पालन करने वाले उत्पादों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि मच्छरों से बचाव तो हो ही लेकिन हमारा स्वास्थ्य किसी भी तरह प्रभावित न हो।

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