बुर्जिस गोदरेज, चेयरपर्सन, गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड
भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है, और हम तरक्की को हाईवे, एयरपोर्ट और ऊंची इमारतों से मापते हैं। मैं कहूंगा कि इस गिनती में हम एक ऐसा पैमाना भूल रहे हैं, जो शोर भले न मचाए, पर उतना ही अहम संकेत देता है: हमारे पशुओं की सेहत।
बुनियादी ढांचा और आय का स्तर विकास की कहानी का सिर्फ एक हिस्सा बताते हैं। मेरा मानना है कि पशुओं की सेहत को भी इस चर्चा में जगह मिलनी चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर इंसानों की सेहत, पोषण और समृद्धि पर पड़ता है। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे लोगों का खान-पान भी बदलता जाता है। अगर भारत चाहता है कि उसके लोग किसी विकसित देश के नागरिकों की तरह खाएं, तो हमें उन पशुओं की सेहत को गंभीरता से लेना होगा, जिनसे उन्हें भोजन मिलता है।
प्रोटीन का सवाल
इसका असल मतलब क्या है? मेरे लिए इसका जवाब एक शब्द में है: प्रोटीन।
आय बढ़ने के साथ प्रोटीन से भरपूर भोजन की चाह भी बढ़ती है, और भारत में यह बदलाव मुझे अभी से दिखाई दे रहा है। यहां समृद्धि चुपचाप हमारी थाली की तस्वीर बदल रही है। अनुमान है कि भारत का प्रोटीन उत्पादों का बाजार 2024 के 38,247 करोड़ रुपये से बढ़कर 2033 तक 1.36 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा। यह उत्साहजनक है, लेकिन यह विस्तार ज्यादातर शहरी है और जीवनशैली से जुड़ा है। इसका बड़ा हिस्सा प्रीमियम डेयरी और पैकेज्ड फूड से आ रहा है।
लेकिन सुर्खियों वाले आंकड़ों से आगे देखें, तो भारत आज भी प्रोटीन की कमी वाला देश है। हम रोजाना लगभग 70 ग्राम प्रोटीन लेते हैं, जबकि अमेरिका, कनाडा और चीन में यह 124 से 125 ग्राम और यूरोपीय संघ में 82 ग्राम है। उप-सहारा अफ्रीका भी 58 ग्राम के साथ हमसे थोड़ा आगे है। हमारे प्रोटीन का लगभग आधा हिस्सा अब भी अनाज से आता है, जो पोषण संबंधी दिशानिर्देशों में बताए गए हिस्से से काफी ज्यादा है, जबकि दालें, जो शाकाहारी प्रोटीन का प्राकृतिक स्रोत हैं, हमारी थाली में कम ही दिखती हैं।
मेरा तर्क: संख्या से पहले पशुओं की सेहत
मुझे लगता है कि अक्सर यहीं पर चर्चा गलत दिशा में चली जाती है। भारत के पास पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी पशुधन आबादी है, और पोल्ट्री उत्पादन में वह दुनिया में पांचवें स्थान पर है। पशुओं की संख्या बढ़ाकर प्रोटीन की यह कमी कभी दूर नहीं होने वाली थी। इसके लिए जरूरत ज्यादा स्वस्थ पशुओं की है।
ज्यादा स्वस्थ पशु अधिक और बेहतर दूध, मांस और अंडे देते हैं। मेरी राय में, इस सेक्टर में उत्पादकता की राह में सबसे बड़ी रुकावट आज भी पशुओं की खराब सेहत ही है। पशु की नस्ल से उत्पादन की अधिकतम सीमा तय होती है। हम उस सीमा के कितने करीब पहुंच पाते हैं, यह पोषण पर निर्भर करता है। और असल में हमारे हाथ कितना आता है, इसका फैसला सेहत करती है। फिलहाल बीमारियों से हमें हर साल अनुमानित 15,000 से 20,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हो रहा है। इसका समाधान मुश्किल नहीं है: टीकाकरण, रोग की जांच, बायो-सिक्योरिटी, और सबसे बढ़कर ऐसा पोषण जो बीमारी होने के बाद इलाज करने के बजाय आंतों की सेहत से शुरू करके रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करे।
कारोबार को संगठित करना क्यों जरूरी है
अनुशासन के बिना इनमें से कुछ भी संभव नहीं है, और मेरे हिसाब से यह अनुशासन बिखरे हुए कारोबार को भरोसेमंद ब्रांड्स के रूप में संगठित करने से आता है। आज भारत का सिर्फ 25 प्रतिशत दूध संगठित चैनलों से बाजार तक पहुंचता है। हम दूसरे क्षेत्रों में देख चुके हैं कि संगठित व्यवस्था क्या कर सकती है। नारियल तेल, खाद्य तेल और यहां तक कि मखाना भी सामान्य कमोडिटी से ऐसे ब्रांड्स में बदल चुके हैं, जिन पर लोग भरोसा करते हैं। यही तरीका डेयरी, मांस और पोल्ट्री को भी आगे बढ़ा सकता है, जिससे किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों को फायदा होगा।
टिकाऊपन के लिहाज से भी इसका फायदा है। दुनिया भर के उत्सर्जन का लगभग पांचवां हिस्सा पशुपालन से आता है। पशुओं के झुंड बड़े करने की जगह बेहतर पोषण पर ध्यान देकर, यानी बोवेयर और मोनेंसिन जैसे एडिटिव्स के इस्तेमाल से, मीथेन उत्सर्जन में 45 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है।
एक और मोर्चा: पालतू जानवर
मैं भारत में पालतू जानवरों से जुड़े तेजी से बढ़ते कारोबार की ओर भी ध्यान दिलाना चाहूंगा। 2018 से 2023 के बीच पालतू जानवरों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई, और 2033 तक उनके भोजन की मांग में भी ऐसी ही बढ़ोतरी का अनुमान है। फिर भी हम हर साल आयात पर पहले से ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं। अगर आत्मनिर्भरता विकसित भारत की कहानी का अहम हिस्सा है, तो इस क्षेत्र में देश में ही उत्पादन क्षमता तैयार करना भी जरूरी है।
आखिरकार, किसी देश की असली प्रगति उसके लोगों की सेहत और खुशहाली से मापी जाती है, और मेरा विश्वास है कि पशुओं की सेहत इस समीकरण के केंद्र में है। हमें पशुओं की संख्या बढ़ाने के बजाय उनकी सेहत सुधारने पर ध्यान देना होगा।









