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BJP का UP Mission 2027 शुरू! योगी के चेहरे के साथ विनोद तावड़े संभालेंगे चुनावी मोर्चा, इन चुनौतियों से होगा सामना

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डॉ आशा शर्मा

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बीजेपी ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. पार्टी ने विनोद तावड़े को यूपी का चुनाव प्रभारी बनाकर संगठन और चुनावी रणनीति को मजबूत करने की कोशिश की है. तावड़े को चुनावी मैनेजमेंट और संगठन दोनों का अच्छा अनुभव माना जाता है. अब उनकी रणनीति और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे का तालमेल 2027 के चुनाव में बीजेपी के लिए कितना असरदार रहता है, इस पर सबकी नजर होगी.

वैसे तावड़े के लिए यूपी कोई नया मैदान नहीं है. अप्रैल 2026 में उनकी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात भी हुई थी. उस समय प्रदेश बीजेपी की टीम, निगम और आयोगों में नियुक्तियों के साथ संभावित मंत्रिमंडल विस्तार जैसे मुद्दों पर चर्चा की खबरें सामने आई थीं. इससे साफ है कि चुनाव प्रभारी बनने से पहले ही तावड़े यूपी की सियासत और संगठन से जुड़े मामलों में सक्रिय थे.

योगी का चेहरा, तावड़े का चुनावी मैनेजमेंट

403 विधानसभा सीटों वाले यूपी में चुनाव जीतना सिर्फ बड़ी रैलियों और बड़े चेहरों के भरोसे संभव नहीं है. बूथ मैनेजमेंट, उम्मीदवारों का चयन, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय मुद्दे और सहयोगी दलों के साथ तालमेल जैसे कई मोर्चों पर पार्टी को एक साथ काम करना होगा. यहां योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज और बीजेपी के चुनावी नैरेटिव को जनता तक पहुंचाने की भूमिका में रहेंगे. वहीं तावड़े की जिम्मेदारी इस संदेश को संगठन और बूथ स्तर तक पहुंचाने की होगी. आसान भाषा में कहें तो चेहरा योगी का, मैनेजमेंट तावड़े का और ताकत बीजेपी के संगठन की होगी.

टिकट बंटवारा बनेगा सबसे बड़ा टेस्ट

2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रदर्शन के बाद यूपी में कई सीटों के समीकरण बदले हैं. ऐसे में 2027 के लिए टिकटों का फैसला पार्टी के लिए बेहद अहम होगा. तावड़े को पुराने मजबूत चेहरों और नए सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा.

जिन सीटों पर पार्टी को नुकसान हुआ, वहां उम्मीदवार बदलने या नए चेहरों पर दांव लगाने का फैसला भी आसान नहीं होगा. जून 2026 में भी संभावित यूपी प्रभारी के तौर पर तावड़े के नाम की चर्चा के दौरान टिकट वितरण और प्रदेश बीजेपी के कोर ग्रुप के साथ तालमेल को बड़ी चुनौती माना जा रहा था.

क्या बिहार का चुनावी अनुभव यूपी में काम आएगा?

तावड़े की पहचान बीजेपी के भीतर एक कुशल चुनावी रणनीतिकार के तौर पर भी होती है. बिहार चुनाव में उनकी भूमिका को लेकर पार्टी के अंदर सकारात्मक चर्चा रही है. अब यूपी जैसी बड़ी चुनावी जमीन पर जिम्मेदारी मिलना उनके अनुभव की अगली बड़ी परीक्षा मानी जा रही है.

हालांकि यूपी और बिहार की राजनीति में काफी अंतर है. पश्चिमी यूपी, अवध, बुंदेलखंड और पूर्वांचल में अलग-अलग मुद्दे और सामाजिक समीकरण हैं. इसलिए बिहार की रणनीति को ज्यों का त्यों लागू करने के बजाय तावड़े को यूपी के हिसाब से अलग प्लान तैयार करना होगा.

योगी सरकार की उपलब्धियों को वोट में बदलना चुनौती

2027 तक योगी सरकार करीब दस साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी होगी. बीजेपी निवेश, एक्सप्रेसवे, इंफ्रास्ट्रक्चर, कानून-व्यवस्था और औद्योगिक विकास को अपनी उपलब्धियों के तौर पर जनता के सामने रखेगी. दूसरी तरफ विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय नाराजगी को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा.

सड़कों और नए एक्सप्रेसवे से जुड़ी खराब निर्माण या धंसने जैसी खबरें भी सरकार के लिए चुनौती बन सकती हैं. ऐसे में तावड़े को सिर्फ संगठन संभालना नहीं होगा, बल्कि सरकार की उपलब्धियों और स्थानीय नाराजगी के बीच संतुलन भी बनाना होगा.

अखिलेश की PDA राजनीति से भी मुकाबला

2027 में अखिलेश यादव की PDA राजनीति बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती बन सकती है. पार्टी पहले से ही छोटे OBC और SC समूहों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. मंत्रिमंडल विस्तार को भी इसी सामाजिक समीकरण से जोड़कर देखा गया था.

अब तावड़े के सामने इस सामाजिक रणनीति को सीटवार चुनावी प्लान में बदलने की चुनौती होगी. किस सीट पर कौन सा समुदाय निर्णायक है, कहां विधायक से नाराजगी है, कहां उम्मीदवार बदलना जरूरी है और किस इलाके में संगठन कमजोर है, इन सभी सवालों का जवाब तलाशना होगा. यही माइक्रो मैनेजमेंट 2027 में बीजेपी की चुनावी रणनीति की असली परीक्षा बन सकता है.

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