पटना/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ बिहार में चुनावी बिसात बिछ चुकी है, एनडीए और महागठबंधन में सीधा मुकाबला बताया जा रहा है, कहा जा रहा है कि अबकी बार भी जाति आधारित चुनाव ही होगा, लेकिन जन सुराज पार्टी ने इस फॉर्मूले पर सोचने को मजबूर कर दिया, जब आंकड़ों के जादूगर प्रशांत किशोर ने अपनी लिस्ट जारी कर दी, उन्होंने भी हर वर्ग को साधने का प्रयास किया, अनुभव का पूरा निचोड़ निकालकर रख दिया, अब जानते हैं कि कौनसी पार्टी का वोट बैंक क्या हुआ करता था-
बिहार में एनडीए के घटक दल
एनडीए में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), जनता दल (यूनाइटेड), लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा जैसे दल हैं। इनके वोट बैंक की बात करें, तो बीजेपी का वोट बैंक संघ की विचारधारा वाला है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, बनिया और सामान्य वर्ग की अन्य जातियां। जनता दल (यूनाइटेड) के पास कुर्मी, दलित, महादलित जातियों का वोट बैंक हुआ करता था। लोकजनशक्ति पार्टी (राम विलास) के पास पासवान समाज, दलित वोटर्स हुआ करते थे। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के दलित, महादलित, मुस्लिम समाज के वोटर्स महत्वपूर्ण हुआ करते थे और उपेंद्र कुशवाह ओबीसी समाज के वोटर्स के भरोसे मैदान में है।
बिहार में महागठबंधन के वोटर्स
इस गठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल (राजद), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) और वामपंथी दल शामिल हैं, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन -सीपीआईएमएल (लिबरेशन) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (सीपीआईएम) शामिल हैं, जिसके अध्यक्ष तेजस्वी यादव हैं। इस गठबंधन की बात करें, तो राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का वोट बैंक MY समीकरण पर टिका रहा है, यानी मुस्लिम और यादव। कांग्रेस हर वर्ग को साधने के प्रयास में रही है, जिसमें दिल्ली की राजनीति का रास्ता खास होता रहा है। तीसरे होते हैं वामपंथी, जोकि पश्चिम बंगाल के हिसाब से राजनीति कर बीजेपी के खिलाफ वाले यानी लेफ्ट विचारधारा वाले वोटर्स को अपना मानते रहे हैं।
प्रशांत किशोर ने बिगाड़ा गणित
कई राजनीतिक दलों के लिए रणनीति बनाने का काम करने वाले प्रशांत किशोर ने जनसुराज के नाम बनाई पार्टी को मैदान में उतारकर कोर वोटर्स वाली थ्योरी को बदलने का काम किया है, पहली बार लड़ने वाली वार्टी का कोर वोटर्स कौन होगा, ये कह पाना तो मुश्किल है, लेकिन उम्मीद्वारों की लिस्ट ने पीके की सोशल इंजीनियरिंग पर से पर्दा उठा दिया और ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि परंपरागत वोट अबकी बार कहां पड़ने वाला है।







