इंदौर/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ भागीरथपुरा में दूषित पेयजल की घटना को लेकर हाई कोर्ट के निर्देश पर कराई गई न्यायिक जांच की रिपोर्ट आज हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड कर दी गई। रिपोर्ट में सामने आया है कि यह घटना किसी एक अधिकारी या एक स्तर की लापरवाही का नतीजा नहीं थी, बल्कि कई वर्षों के दौरान अलग-अलग स्तरों पर हुई चूकों, कमजोर निगरानी, रखरखाव में कमी और प्रशासनिक देरी का सामूहिक परिणाम थी।
बुनियादी ढ़ांचे पर सवाल
जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिम्मेदारी के दायरे में उन अधिकारियों को भी शामिल किया है, जो क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों को बदलने से संबंधित निविदा प्रक्रिया, तकनीकी जांच, अनुमोदन और उन्हें अंतिम रूप देने की कार्रवाई से जुड़े थे। आयोग ने माना कि निर्माण के समय हुई खामियों के बाद लंबे समय तक बुनियादी ढांचे की निगरानी और रखरखाव में कमी रही तथा खराब पाइपलाइनों को समय पर बदलने में भी देरी हुई।
1990 से शुरू हुई चूकों की कड़ी
आयोग के अनुसार, तत्कालीन इंदौर विकास प्राधिकरण के वे अधिकारी, इंजीनियर और तकनीकी अधिकारी भी जिम्मेदारी के दायरे में आते हैं, जो वर्ष 1990 से 1995 के बीच सीवरेज परियोजना की योजना, डिजाइन और क्रियान्वयन तथा 1999 से 2004 के बीच सीवरेज पाइपलाइन बिछाने के काम से जुड़े थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन कार्यों में CPHEEO मैनुअल में निर्धारित प्रावधानों का पालन नहीं किया गया।
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नगर निगम की निगरानी पर भी सवाल
रिपोर्ट में इंदौर नगर निगम के उन अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिन्हें शहर की सीवरेज और पेयजल व्यवस्था के संचालन, रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। आयोग के मुताबिक संबंधित अधिकारी समय रहते बुनियादी ढांचे में आ रही खराबी को चिन्हित करने, उसे रोकने और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने में सफल नहीं रहे।
संजीव कुमार श्रीवास्तव की भूमिका का उल्लेख
आयोग ने अधीक्षण यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव की भूमिका का भी विशेष रूप से उल्लेख किया है। रिपोर्ट के मुताबिक वे वर्ष 2013 से 2026 तक लगातार पदस्थ रहे और संबंधित क्षेत्र की जलापूर्ति व्यवस्था के रखरखाव की जिम्मेदारी संभालने वाले वरिष्ठ तकनीकी अधिकारियों में शामिल थे। आयोग ने माना कि कमजोर पाइपलाइन नेटवर्क का पर्याप्त निरीक्षण, निवारक रखरखाव, समय पर पाइपलाइन बदलने और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित नहीं हो सकी।
पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया में देरी
क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों को बदलने के लिए शुरू की गई निविदा प्रक्रिया को लेकर भी आयोग ने प्रशासनिक देरी को महत्वपूर्ण माना है। रिपोर्ट के अनुसार निविदाओं की प्रक्रिया और उन्हें अंतिम रूप देने में हुई देरी के कारण सुधारात्मक कार्य समय पर नहीं हो सके। आयोग ने माना कि इस देरी ने दूषित जल की घटना के जोखिम को बढ़ाने में भूमिका निभाई।
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कई स्तरों की चूक का संयुक्त परिणाम
आयोग ने स्पष्ट किया कि इस मामले में जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या विभाग तक सीमित नहीं है। निर्माण के दौरान हुई मूल तकनीकी खामी, इसके बाद लंबे समय तक रखरखाव और निगरानी में रही कमी तथा क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को बदलने में हुई प्रशासनिक देरी—इन सभी कारणों ने मिलकर ऐसी परिस्थितियां तैयार कीं, जिनका परिणाम भागीरथपुरा के लोगों को दूषित पेयजल मिलने के रूप में सामने आया।
विस्तृत विभागीय जांच की सिफारिश
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अलग-अलग समय पर कार्यपालन यंत्री, अधीक्षण यंत्री और अन्य इंजीनियरिंग अधिकारी संबंधित विभागों में पदस्थ रहे और जलापूर्ति तथा सीवरेज व्यवस्था की निगरानी एवं रखरखाव का दायित्व निभाते रहे। ऐसे में यह निर्धारित करने के लिए विस्तृत जांच की जरूरत है कि संबंधित अधिकारियों ने अपने-अपने कार्यकाल में निर्धारित वैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का उचित तरीके से निर्वहन किया था या नहीं।
विस्तृत जांच की जताई जरुरत
आयोग ने इसलिए विस्तृत विभागीय जांच की आवश्यकता बताई है। इस जांच में संबंधित अवधि में पदस्थ अधिकारियों, उन्हें सौंपी गई जिम्मेदारियों, उनके द्वारा किए गए अथवा नहीं किए गए कार्यों और किसी भी प्रकार की लापरवाही, निष्क्रियता या कर्तव्य में चूक की पहचान की जानी है।









