उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी में संगठन और नेतृत्व को लेकर हलचल तेज हो गई है. पार्टी प्रमुख मायावती द्वारा वरिष्ठ नेता अशोक सिद्धार्थ को निष्कासित किए जाने के बाद बसपा की अंदरूनी राजनीति चर्चा में आ गई है. अशोक सिद्धार्थ का संबंध आकाश आनंद के परिवार से होने के कारण इस घटनाक्रम को राजनीतिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की तैयारी में जुटी है. पार्टी दलित, ओबीसी और सवर्ण मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है. हालांकि, इसी बीच संगठन के अंदर हुए घटनाक्रम ने पार्टी की तैयारियों और नेतृत्व की भूमिका को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
अशोक सिद्धार्थ के निष्कासन से बढ़ी राजनीतिक चर्चा
बसपा प्रमुख मायावती ने वरिष्ठ नेता अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निष्कासित कर दिया है. अशोक सिद्धार्थ का संबंध आकाश आनंद के परिवार से भी है, जिसके बाद यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया. उनके निष्कासन के बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है. इससे संगठन के भीतर चल रही स्थिति को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं.
लखनऊ में हुई बैठक में बनी थी चुनावी रणनीति
सूत्रों के अनुसार, करीब दो सप्ताह पहले मायावती ने आकाश आनंद का राजस्थान दौरा रद्द कर उन्हें और पार्टी उपाध्यक्ष आनंद कुमार को लखनऊ बुलाया था. इस दौरान तीन दिनों तक विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर विस्तार से चर्चा हुई थी.
बैठक में आकाश आनंद को प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया में भूमिका देने और कार्यकर्ता सम्मेलनों की जिम्मेदारी सौंपने पर सहमति बनी थी. हाथरस और जेवर में उनके कार्यक्रम भी प्रस्तावित किए गए थे.
प्रत्याशी चयन का अधिकार मायावती ने अपने पास रखा
इसके बाद मायावती ने उम्मीदवारों के चयन का अंतिम अधिकार अपने पास रखने का फैसला किया. इस निर्णय के बाद आकाश आनंद की चुनावी जिम्मेदारियां पहले की तुलना में सीमित होती नजर आईं. राजनीतिक हलकों में इसे पार्टी के भीतर जिम्मेदारियों में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है.
सोशल मीडिया समर्थन के बाद भी बदला घटनाक्रम
दिलचस्प बात यह है कि अशोक सिद्धार्थ ने सोशल मीडिया पर मायावती के इस फैसले का समर्थन किया था. इसके बावजूद बाद में उनके खिलाफ पार्टी कार्रवाई की गई. इस पूरे घटनाक्रम ने बसपा के अंदर नेतृत्व और संगठन की दिशा को लेकर चर्चा शुरू कर दी है.
चुनाव से पहले संगठन की मजबूती बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा का सामाजिक समीकरण हमेशा अहम रहा है. आगामी चुनाव को देखते हुए पार्टी के सामने अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने के साथ नए सामाजिक समूहों को जोड़ने की चुनौती है. ऐसे में संगठन के भीतर होने वाले बदलाव चुनावी रणनीति पर कितना असर डालेंगे, यह आने वाले समय में साफ होगा.









