निर्मल विश्वकर्मा, चंदेरी। ऐतिहासिक धरोहर और विश्वप्रसिद्ध हथकरघा साड़ी के लिए विख्यात चंदेरी की अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग पर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना का अधिकार (RTI) से खुलासा हुआ है कि मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के पास चंदेरी साड़ी के यूनेस्को से जुड़े दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं हैं। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. योगेश मिश्रा द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में बोर्ड ने यह स्पष्ट किया है।
यूनेस्को की सूची में 2014 से दर्ज है नाम
यूनेस्को की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 15 अप्रैल 2014 से ही चंदेरी साड़ी को भारत के आइकॉनिक साड़ी वीविंग क्लस्टर के तहत यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल किया जा चुका है। इसके बावजूद मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के प्लानिंग विभाग का कहना है कि उनके स्तर पर इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की गई, इसलिए कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि 12 वर्षों से सार्वजनिक रूप से मौजूद इस अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि को लेकर राज्य स्तर पर अपेक्षित तत्परता क्यों नहीं दिखाई गई?


2019 की फीजिबिलिटी स्टडी पर भी चुप्पी
मामला केवल अस्थायी सूची तक सीमित नहीं है। वर्ष 2019 में तत्कालीन प्रबंध संचालक फैज़ अहमद किदवई के पत्राचार के बाद चंदेरी को यूनेस्को क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क में शामिल करने के लिए एक फीजिबिलिटी स्टडी कराई गई थी। RTI के जवाब में बोर्ड ने अध्ययन की बात तो स्वीकार की, लेकिन यह भी माना कि इसके निष्कर्षों के आधार पर यूनेस्को के साथ आगे कोई पत्राचार या ठोस कार्रवाई नहीं की गई। सवाल यह है कि अध्ययन के बाद जब कोई फॉलो-अप ही नहीं हुआ, तो उस पहल का औचित्य क्या रहा?
विरासत के संरक्षण और पर्यटन विकास की दरकार
चंदेरी की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, किले और हथकरघा उद्योग न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पर्यटन की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि चंदेरी को यूनेस्को की स्थाई मान्यता दिलाने के प्रयास तेजी से किए जाते, तो इससे स्थानीय रोजगार और हस्तशिल्प को नई दिशा मिल सकती थी।









