- भारत भवन में हुआ रूपाभ श्रृंखला के तहत प्रदर्शनी का शुभारंभ
भोपाल: भारत भवन की रंगदर्शनी दीर्घा मंगलवार को रंग, रेखा, रूप और भावों के ऐसे संगम की साक्षी बनी, जहां प्रख्यात कलागुरु लक्ष्मीनारायण भावसार की कला-परंपरा उनके शिष्यों के कैनवास पर अलग-अलग रंग-संवेदनाओं और कलात्मक अभिव्यक्तियों के साथ आकार लेती दिखाई दी। समकालीन कला को मंच प्रदान करने वाली प्रदर्शनी श्रृंखला ‘रुपाभ’ के अंतर्गत आयोजित इस समूह चित्र प्रदर्शनी का शुभारंभ उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने किया। प्रदर्शनी में भावसार के शिष्यों की विविध शैलियों और कला-दृष्टि से परिचित कराने वाली कुल 40 कृतियां प्रदर्शित की गई हैं। कला प्रेमियों के लिए यह प्रदर्शनी 4 अक्टूबर तक खुली रहेगी। प्रदर्शनी में शीला गर्ग, आलोक भावसार, राजू राठौर, वंदना शर्मा, निलेश उपाध्याय, शैलेन्द्र नामदेव, शंकर राजपूत, रविन्द्र भावसार, कल्पित सोनी और आदित्य भावसार की कृतियां शामिल हैं। इन चित्रों में कहीं प्रकृति की सहज लय है तो कहीं मानवीय संवेदनाओं का सूक्ष्म संसार। कहीं लोक संस्कृति रंगों में मुखर होती है तो कहीं आध्यात्मिक अनुभूति अमूर्त रूपों और प्रतीकों के माध्यम से कैनवास पर उतरती है। उद्घाटन अवसर पर भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रेम शंकर शुक्ल सहित बड़ी संख्या में कला प्रेमी उपस्थित रहे। प्रदर्शनी में गुरु-शिष्य परंपरा, स्मृति, प्रकृति, लोक संस्कृति और समकालीन संवेदना एक साथ रंगों के माध्यम से आकार लेती दिखाई देती है।
27 से 60 वर्ष तक के कलाकारों की कलाकृतियां
इस प्रदर्शनी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें कलागुरु लक्ष्मीनारायण भावसार से जुड़े अलग-अलग पीढ़ियों के कलाकारों की रचनात्मक यात्रा एक साथ दिखाई देती है। उनके 27 वर्षीय शिष्य से लेकर 60 वर्ष से अधिक आयु के कलाकारों तक की कृतियां यहां प्रदर्शित हैं। इस तरह प्रदर्शनी केवल चित्रों का संकलन नहीं, बल्कि एक गुरु से शिष्य तक पहुंची कला-दृष्टि और उसके बदलते रूपों का जीवंत दस्तावेज भी बनती है।
लोक संस्कृति से आध्यात्मिकता तक
कलाकार कल्पित सोनी ने अपनी कृतियों में आंतरिक आध्यात्मिकता को दृश्य रूप देने का प्रयास किया है। पिछले आठ वर्षों से चित्रकला में सक्रिय सोनी लोक कलाओं को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं। उनके चित्रों में लोक जीवन की छवियों के साथ अलग-अलग संस्कृतियों का प्रभाव दिखाई देता है। वे हिमाचल की रावला और रावली लोक संस्कृति तथा जापान की लोक कला के बीच संबंधों को अपनी कलात्मक दृष्टि से देखने का प्रयास करते हैं। आलोक भावसार ने ‘गुपचुप’, ‘मन की बात’ और ‘प्रतीक्षा’ जैसे शीर्षकों के माध्यम से स्त्री जीवन के विभिन्न रूपों और मनोभावों को चित्रित किया है। उनके फिगरेटिव वर्क में स्त्री आकृतियां केवल दृश्य संरचना का हिस्सा नहीं, बल्कि भावनाओं और सामाजिक अनुभवों की अभिव्यक्ति बनकर सामने आती हैं। करीब तीन दशकों से कला साधना में सक्रिय डॉ. वंदना शर्मा ने अपने गुरु लक्ष्मीनारायण भावसार का पोर्ट्रेट तैयार किया था। यह चित्र वे अपने गुरु को भेंट करना चाहती थीं, लेकिन भावसार के आकस्मिक निधन के कारण वह भाव आज भी उनके भीतर एक कश्मकश की तरह मौजूद है। उनके प्रस्तुत रियलिस्टिक वर्क में प्रकृति, विशेषकर पेड़, विभिन्न रूपों और संरचनाओं के साथ दिखाई देते हैं।
स्मृतियों को कैनवास पर संजोती कला
शीला गर्ग ने बताया कि वे वर्ष 1970 से लक्ष्मीनारायण भावसार के सान्निध्य में रहीं और तभी से निरंतर चित्रकला के क्षेत्र में सक्रिय हैं। लैंडस्केप, नेचर और फिगरेटिव वर्क उनकी पसंदीदा कला विधाएं हैं, जबकि ऑयल माध्यम उनकी कार्यशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। उन्होंने भावसार के साथ अजंता-एलोरा की यात्रा की स्मृतियों को भी अपनी कला-यात्रा से जोड़ा। उनका कहना है कि वर्षों पहले जिन गुफाओं को उन्होंने वहां देखा था, उनमें से कुछ अब पहले जैसी नहीं रहीं, लेकिन उन स्मृतियों को उन्होंने इंदौर के न्यू गर्ल्स डिग्री कॉलेज की दीवारों पर उकेरने का प्रयास किया।







