मध्यप्रदेश की राजनीति में ग्वालियर एक बार फिर चर्चा का बड़ा केंद्र बन गया है. खुद को कट्टर सिंधिया समर्थक बताने वाले पूर्व पार्षद देवेंद्र पाठक के बयानों ने भाजपा के भीतर हलचल बढ़ा दी है. भाजपा छोड़ने के बाद अब पाठक खुलकर पार्टी और सिंधिया समर्थक नेताओं की स्थिति पर सवाल उठा रहे हैं. उनके बयानों की गूंज सिर्फ ग्वालियर तक सीमित नहीं है, बल्कि भोपाल और दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में भी इसकी चर्चा तेज हो गई है.
Jyotiraditya Scindia की ताकत हुई कम
देवेंद्र पाठक ने साफ तौर पर कहा कि भाजपा सरकार में अब Jyotiraditya Scindia की पहले जैसी ताकत और पकड़ दिखाई नहीं देती. उन्होंने दावा किया कि सिंधिया समर्थक नेताओं और मंत्रियों की बात सरकार में गंभीरता से नहीं सुनी जा रही है. पाठक ने उदाहरण देते हुए कहा कि जब तुलसीराम सिलावट, गोविंद सिंह राजपूत और प्रद्युम्न सिंह तोमर जैसे बड़े नेताओं के काम तक नहीं हो पा रहे हैं, तो फिर सत्ता में बने रहने का क्या फायदा है.
सिंधिया समर्थक नेताओं को पार्टी में सम्मान नहीं
उन्होंने तीखे अंदाज में सवाल उठाया कि अगर सिंधिया समर्थक नेताओं को पार्टी में सम्मान नहीं मिल रहा, तो वे अब तक पदों पर क्यों टिके हुए हैं. पाठक का आरोप है कि भाजपा में धीरे-धीरे सिंधिया खेमे को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में निगम-मंडलों में हुई नियुक्तियों में भी सिंधिया समर्थकों को पर्याप्त जगह नहीं दी गई.
कांग्रेस में शामिल होने की संभावनाएं तेज
राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा उनके कांग्रेस में शामिल होने की संभावनाओं को लेकर हो रही है. जब उनसे कांग्रेस में जाने को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने साफ इनकार नहीं किया. इसके बाद ग्वालियर की राजनीति में अटकलों का दौर और तेज हो गया है. सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में देवेंद्र पाठक बड़ा राजनीतिक फैसला ले सकते हैं. अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या पाठक वास्तव में कांग्रेस का दामन थामेंगे या फिर यह नाराजगी भाजपा के भीतर ही नए सियासी संकट को जन्म देगी. ग्वालियर से उठी यह राजनीतिक हलचल आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति पर बड़ा असर डाल सकती है.
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