मध्यप्रदेश भाजपा की अंदरूनी खींचतान अब सतह पर आ चुकी है. इस बार विवाद का केंद्र बना है विंध्य विकास प्राधिकरण. प्राधिकरण के अध्यक्ष और पूर्व विधायक पंचूलाल प्रजापति ने उपाध्यक्ष डॉ. अजय सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से शिकायत कर दी है. प्रजापति का आरोप है कि उपाध्यक्ष उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं, कामकाज में बेवजह दखल दे रहे हैं और अफसरों पर दबाव बना रहे हैं. उन्होंने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और सख्त कदम उठाने की मांग रखी है.
यह मामला सिर्फ शासन-प्रशासन तक सीमित नहीं रहा. शिकायत की कॉपियां पार्टी के प्रदेश प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री और रीवा-शहडोल संभाग के वरिष्ठ संगठन पदाधिकारियों तक भी पहुंचाई गई हैं. साफ है कि यह अंदरूनी रार अब पार्टी संगठन के लिए भी बड़ी सिरदर्दी बन चुकी है.
शिकायत में प्रजापति ने साफ लिखा है कि डॉ. अजय सिंह की दखलअंदाजी से प्राधिकरण का काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. उन्होंने दावा किया कि रीवा के कलेक्टर और कमिश्नर पर अनुचित दबाव बनाया जा रहा है. इसके अलावा शहडोल में पदस्थ जिला योजना अधिकारी डीके अहिरवार की नियुक्ति को लेकर भी उन्होंने सवाल खड़े किए हैं. अध्यक्ष का तर्क है कि इन अड़चनों की वजह से वे अपनी जिम्मेदारियां ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं. हालांकि, इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है.
विवाद तब और ज्यादा बढ़ गया जब प्रजापति ने उपाध्यक्ष पर जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हुए रीवा के अजाक थाने में शिकायत दर्ज करा दी. उन्होंने कहा कि इस तरह के बर्ताव से उनके पद और आत्मसम्मान को ठेस पहुंची है. हालांकि, राजनीतिक मोर्चे पर हलचल मचने के ठीक अगले दिन उन्होंने अपनी शिकायत वापस भी ले ली.
बताया जा रहा है कि इस खींचतान की मुख्य जड़ मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) की कुर्सी है. शुरुआत में अध्यक्ष प्रजापति ने पुराने CEO को हटवाकर तृतीय श्रेणी अधिकारी केडी साकेत को जिम्मेदारी दिला दी थी, जिस पर दोनों उपाध्यक्षों ने कड़ा ऐतराज जताया था. बाद में शासन ने साकेत को हटाकर प्रथम श्रेणी अधिकारी डीके अहिरवार को नया CEO बना दिया. इसी के बाद से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रिश्ते और ज्यादा बिगड़ गए.
उधर, उपाध्यक्ष डॉ. अजय सिंह ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है. उनका कहना है कि उन्हें ऐसी किसी शिकायत की जानकारी ही नहीं है और न ही उन्होंने कोई अभद्र या जातिसूचक टिप्पणी की है. अब सभी की निगाहें भोपाल के सियासी गलियारों और संगठन के रुख पर टिकी हैं कि यह कलह वहीं थम जाएगी या आने वाले दिनों में और गहराएगी.







