मध्य प्रदेश भाजपा में इन दिनों नई प्रदेश कार्यसमिति को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. राजधानी भोपाल से लेकर जिलों तक बैठकों और चर्चाओं का दौर जारी है. पार्टी ने कार्यसमिति की पहली बैठक के लिए धार्मिक नगरी ओरछा को चुना है, लेकिन उससे पहले सबसे बड़ा सवाल नई सूची को अंतिम रूप देने का बना हुआ है. कई नेता संगठन में जगह पाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं और इसी वजह से अंदरूनी समीकरणों पर लगातार मंथन चल रहा है.
हेमंत खंडेलवाल का ये मास्टर प्लान
सूत्रों के मुताबिक प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल इस बार कार्यसमिति को सीमित आकार में रखना चाहते हैं. पार्टी संविधान के अनुसार करीब 106 सदस्यों तक ही समिति को रखने की तैयारी है. साथ ही विशेष आमंत्रित सदस्यों की संख्या भी कम रखने पर विचार किया जा रहा है. पिछले कुछ वर्षों में कार्यसमिति का आकार लगातार बढ़ता गया था और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के कार्यकाल में यह संख्या 463 तक पहुंच गई थी. अब पार्टी छोटी लेकिन ज्यादा सक्रिय और प्रभावी टीम बनाने के पक्ष में दिखाई दे रही है.
युवा चेहरों को शामिल करने पर दबाव
हालांकि यह फैसला संगठन के लिए आसान नहीं माना जा रहा. प्रदेश के 62 संगठनात्मक जिलों की अपनी अलग राजनीतिक अपेक्षाएं हैं. ऐसे में सीमित जगह के भीतर क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण, वरिष्ठ नेताओं की भूमिका, महिलाओं की भागीदारी और नए चेहरों को अवसर देना पार्टी नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती बन गया है. कई पुराने नेता अपने लंबे संगठनात्मक अनुभव के आधार पर जगह चाहते हैं, जबकि युवा चेहरों को भी शामिल करने का दबाव बना हुआ है.
भाजपा बना रही रणनीति
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल कार्यसमिति गठन नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर भविष्य की ताकत और नेतृत्व तय करने की प्रक्रिया भी है. मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव, शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक नेताओं के बीच संतुलन बनाना संगठन के लिए अहम माना जा रहा है, ताकि किसी भी गुट में असंतोष खुलकर सामने न आए. इसी बीच कांग्रेस ने भी भाजपा पर निशाना साधना शुरू कर दिया है. विपक्ष का कहना है कि भाजपा अंदरूनी खींचतान से जूझ रही है और इसी कारण कार्यसमिति गठन में देरी हो रही है. हालांकि भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा कर रही है कि संगठन में सभी वर्गों और क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाएगा.
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