MP News: केपी यादव का भविष्य क्या? सत्ता से दूर होती सियासत का नया गणित!

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MP News: केपी यादव का भविष्य क्या? सत्ता से दूर होती सियासत का नया गणित!

भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर हलचल तेज हो चुकी है और इस हलचल का केंद्र गुना–अशोकनगर की राजनीति बनती जा रही है। चर्चा यह थी कि मंत्रिमंडल विस्तार में गुना लोकसभा क्षेत्र से जुड़े पूर्व सांसद के.पी. यादव को निगम–मंडल या मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। लेकिन जैसे ही यह चर्चा राजनीतिक गलियारों में तेज हुई, वैसे ही केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से इसका विरोध सामने आने की बात कही जाने लगी। बताया जा रहा है कि सिंधिया खेमे की ओर से स्पष्ट तौर पर यह संदेश दिया गया कि यदि गुना–अशोकनगर क्षेत्र से किसी को अवसर देना है तो उनके समर्थक विधायक बृजेंद्र सिंह यादव का नाम आगे किया जाए।

केपी यादव ने दिया था संदेश
यहीं से यह मामला केवल एक पद का नहीं रहा बल्कि यह सीधे-सीधे प्रतिष्ठा और प्रभाव की लड़ाई में बदलता दिखाई देने लगा। गुना की राजनीति का इतिहास गवाह है कि कभी यह क्षेत्र सिंधिया परिवार का मजबूत गढ़ माना जाता था, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में के.पी. यादव ने इसी सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था। उस चुनाव ने पूरे प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी थी और यह माना गया था कि जमीन से उठकर आने वाले एक साधारण कार्यकर्ता ने एक बड़े राजनीतिक घराने को चुनौती दी है। यही कारण है कि आज जब फिर से के.पी. यादव का नाम मंत्रिमंडल विस्तार से जुड़ता दिखाई देता है तो यह केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं बल्कि पुराने राजनीतिक समीकरणों की याद भी दिला देता है।

केपी यादव ने जीता था चुनाव
दूसरी ओर अशोकनगर और गुना क्षेत्र में स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच भी अलग तरह की चर्चा देखने को मिल रही है। कई कार्यकर्ता खुले तौर पर यह कहते दिखाई दे रहे हैं कि के.पी. यादव ने क्षेत्र में संगठन के साथ लंबे समय तक काम किया है और जमीन से जुड़े हुए नेता हैं, इसलिए उन्हें अवसर मिलना चाहिए। स्थानीय स्तर पर यह समर्थन अब धीरे-धीरे राजनीतिक चर्चा का विषय बनता जा रहा है। कई जगहों पर यह भी कहा जा रहा है कि यदि क्षेत्र के जनाधार और कार्यकर्ताओं की भावना को देखा जाए तो के.पी. यादव का नाम स्वाभाविक रूप से आगे आता है।

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यादव अस्मिता की बात
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और बड़ा राजनीतिक समीकरण सामने आ रहा है और वह है यादव समाज का प्रतिनिधित्व। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं यादव समाज से आते हैं और प्रदेश की राजनीति में यह समाज एक प्रभावशाली भूमिका निभाता है। ऐसे में यह सवाल भी उठने लगा है कि यदि गुना–अशोकनगर क्षेत्र से यादव समाज के किसी नेता को अवसर मिलता है तो उसका सामाजिक और राजनीतिक संदेश क्या होगा। राजनीतिक चर्चाओं में यह बात भी कही जा रही है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्व में कहा था कि यादव समाज की चिंता वह स्वयं करेंगे। अब ऐसे में यदि इस समाज से जुड़े नेता को अवसर मिलता है तो उसे एक व्यापक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जाएगा।

मात्र निगम-मंडल की आस
लेकिन इसी के साथ एक दूसरा सवाल भी लगातार उठ रहा है कि आखिर इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय किसका चलेगा। क्या प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव वास्तव में अपने स्तर पर निर्णय लेने की स्थिति में हैं या फिर भाजपा की आंतरिक राजनीति में बड़े नेताओं का प्रभाव अंतिम निर्णय को तय करेगा। क्योंकि यदि के.पी. यादव को निगम मंडल या मंत्रिमंडल में स्थान मिलता है तो इसे सीधे तौर पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक प्रभाव को चुनौती के रूप में देखा जाएगा। वहीं अगर बृजेंद्र सिंह यादव को अवसर दिया जाता है तो यह संकेत होगा कि गुना–अशोकनगर क्षेत्र की राजनीति में आज भी सिंधिया का प्रभाव कायम है।

गुना की सियासत का माहौल
यही वजह है कि आज प्रदेश की राजनीति में यह सवाल तेजी से घूम रहा है कि इस मंत्रिमंडल विस्तार में किसकी जीत होगी और किसकी हार। क्या भाजपा के अंदर उभरती नई राजनीतिक ताकतें अपना स्थान बनाएंगी या फिर पुराने प्रभाव और पुराने समीकरण ही अंतिम फैसला तय करेंगे। गुना लोकसभा क्षेत्र की राजनीति अब केवल स्थानीय राजनीति नहीं रह गई है बल्कि यह प्रदेश की सत्ता के भीतर चल रहे शक्ति संतुलन की कहानी भी बनती जा रही है।

यादव बनाम यादव
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि जब मंत्रिमंडल विस्तार की अंतिम सूची सामने आएगी तो उसमें किसका नाम होगा। अगर के.पी. यादव को स्थान मिलता है तो इसे राजनीतिक रूप से एक बड़ा संदेश माना जाएगा कि भाजपा के अंदर केवल एक ही शक्ति केंद्र नहीं है। लेकिन यदि बृजेंद्र सिंह यादव का नाम सामने आता है तो यह साफ संकेत होगा कि गुना–अशोकनगर क्षेत्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव अभी भी उतना ही मजबूत है जितना पहले माना जाता था।

सियासत के ताजा समीकरण
मध्य प्रदेश की राजनीति में कई बार छोटे फैसले भी बड़े राजनीतिक संकेत बन जाते हैं और यह मंत्रिमंडल विस्तार भी शायद ऐसा ही एक फैसला साबित होने वाला है। आने वाले समय में यह साफ हो जाएगा कि इस राजनीतिक संघर्ष में किसकी रणनीति भारी पड़ी और किसका प्रभाव प्रदेश की सत्ता के गलियारों में ज्यादा मजबूत साबित हुआ।

https://khabardigital.com/madhya-pradesh/mp-minister-gautam-tetwal-caste-certificate-case-indore-high-court/
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