MP Congress: मध्यप्रदेश में राज्यसभा की तीसरी सीट को बिना लड़े ही गंवाने का घाव कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को बुरी तरह चुभ गया है। 9 जून को भोपाल विधानसभा में हुए नामांकन निरस्त होने के बाद, दिल्ली में AICC ने सूबे के बड़े नेताओं की जवाबदेही तय करने का मन पूरी तरह बना लिया है। दिल्ली के राजनैतिक गलियारों से आ रही खबर के मुताबिक, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को हटाए जाने की सुगबुगाहट के बीच, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के सुपुत्र और राघौगढ़ से कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह का नाम सबसे आगे चल रहा है। सूत्रों का दावा है कि केंद्रीय आलाकमान मध्यप्रदेश में डैमेज कंट्रोल और बगावत को रोकने के लिए जयवर्धन सिंह को अहम जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी में है।
जयवर्धन सिंह पर दांव क्यों?
सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रीय नेतृत्व मध्यप्रदेश के युवा और पढ़े-लिखे चेहरे जयवर्धन सिंह को या तो मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष नियुक्त कर सकता है या फिर विधानसभा के अंदर भाजपा को घेरने के लिए उन्हें नेता प्रतिपक्ष की कमान सौंप सकता है। जयवर्धन सिंह की छवि सुलझे हुए और सभी गुटों में स्वीकार्य नेता की है। राज्यसभा प्रत्याशी का फॉर्म निरस्त होने के बाद भोपाल एयरपोर्ट पर जिस तरह से कांग्रेस विधायकों की बगावत खुलकर सामने आई है, उसे दबाने और विधायकों को पाला बदलने से रोकने के लिए आलाकमान को किसी ऐसे ही मजबूत चेहरे की सख्त दरकार है।
डमी फॉर्म बना गले की फांस
आलाकमान का मानना है कि इतनी बड़ी लड़ाई में बैकअप के तौर पर किसी स्थानीय नेता का डमी फॉर्म न भरवाना प्रदेश इकाई का सबसे बड़ा ब्लंडर था। इसी लापरवाही के कारण भाजपा के महेश केवट बिना मुकाबला किए ही संसद पहुंच सकते है। सूत्रों का कहना है कि अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के बीच समन्वय की कमी भी इस हार की एक बड़ी वजह रही है। यही कारण है कि बदलाव केवल संगठन में नहीं, नेता प्रतिपक्ष में भी एक साथ किया जा सकता है। दोनों नेताओं से किसी भी समय जबाव मांगा जा सकता है।
राघौगढ़ के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी
राजनैतिक जानकारों की माने तो यदि जयवर्धन सिंह को मध्य प्रदेश कांग्रेस की कमान मिलती है, तो यह सूबे की राजनीति में दिग्विजय सिंह युग की एक नए रूप में वापसी जैसा होगा। जयवर्धन के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिखरे हुए कार्यकर्ताओं को एकजुट करना, गुटबाजी को समाप्त करना और साल 2027 के स्थानीय निकाय चुनावों के साथ-साथ 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी को नए सिरे से खड़ा करना होगा। बहरहाल, दिल्ली से हरी झंडी मिलने का इंतजार है, लेकिन इस एक नाम ने भोपाल के राजनैतिक पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। हालांकि आपको बता दें कि इस खबर की हम पूरी तरह से पुष्टि नहीं करते है।









