मध्य प्रदेश में निगमों, मंडलों और प्राधिकरणों में नियुक्तियों का दौर तेजी से जारी है. अब तक अध्यक्ष और सदस्यों को मिलाकर करीब 60 लोगों को जिम्मेदारी दी जा चुकी है. इन नियुक्तियों में ग्वालियर चंबल क्षेत्र के नेताओं की मजबूत मौजूदगी देखने को मिली है, जिससे यह संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखा गया है.
ज्योतिरादित्य सिंधिया के इन चहेतों को नहीं मिली है जगह
हालांकि एक दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए कई नेताओं को अभी तक इन पदों में जगह नहीं मिल पाई है. इनमें पूर्व मंत्री इमरती देवी समेत कई प्रमुख समर्थक शामिल हैं, जो अब भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं.
राजनीतिक गलियारों में शुरुआत से ही चर्चा थी कि सिंधिया अपने समर्थकों को किसी न किसी रूप में सरकार में समायोजित कराने की कोशिश करेंगे. बताया जा रहा है कि उन्होंने अपने करीब पांच नेताओं को निगम मंडल में पद दिलाने के लिए काफी प्रयास किए. इन नामों में इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसोदिया, ओपीएस भदौरिया, गिरिराज दंडोतिया और मुन्नालाल गोयल शामिल बताए जाते हैं. इसके लिए उन्होंने दिल्ली से लेकर भोपाल तक सक्रिय रूप से प्रयास किए. उनका तर्क रहा है कि ये वे नेता हैं जिन्होंने राजनीतिक जोखिम उठाते हुए पार्टी बदली थी, इसलिए उन्हें जिम्मेदारी मिलनी चाहिए.
नियुक्तियों में व्यापक संतुलन बनाने की कोशिश
दूसरी तरफ सरकार और संगठन का पक्ष यह है कि नियुक्तियों में केवल एक समूह को प्राथमिकता देने के बजाय व्यापक संतुलन बनाने की कोशिश की गई है. इसमें जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और पुराने तथा नए नेताओं के बीच तालमेल को ध्यान में रखा गया है. माना जा रहा है कि जिन नेताओं को अभी मौका नहीं मिला है, उन्हें आने वाले चरणों में जिम्मेदारी दी जा सकती है. कुल मिलाकर यह पूरी प्रक्रिया केवल पद बांटने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए राजनीतिक संतुलन साधने और संगठन को मजबूत करने की रणनीति भी साफ नजर आ रही है.
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