मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने मल्टी ईयर टैरिफ से संबंधित प्रस्तावित नियम और शर्तों पर उपभोक्ताओं से आपत्ति और सुझाव मांगे हैं. इसके लिए 1 सितंबर तक का समय दिया गया है. इस पूरी प्रक्रिया में वितरण हानि यानी लाइन लॉस का स्तर सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल है.
प्रस्ताव के मुताबिक पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी का वितरण लॉस 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 23 प्रतिशत किए जाने का अनुमान रखा गया है. वहीं मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के लिए यह आंकड़ा 24.5 प्रतिशत प्रस्तावित किया गया है. इन आंकड़ों के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि भविष्य में इसका असर बिजली उपभोक्ताओं के बिल पर कितना पड़ेगा.
ज्यादा लाइन लॉस का मतलब सीधे महंगी बिजली नहीं
हालांकि वितरण हानि का प्रतिशत बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि बिजली की दर सीधे उसी अनुपात में बढ़ जाएगी. टैरिफ तय करते समय आयोग बिजली खरीद की लागत, ट्रांसमिशन खर्च, वितरण व्यवस्था, संचालन और रखरखाव, पूंजीगत निवेश तथा कंपनियों की राजस्व जरूरत जैसे कई पहलुओं की समीक्षा करता है. इन सभी आंकड़ों के आधार पर अंतिम बिजली दर निर्धारित की जाती है.
फिर भी यदि ज्यादा वितरण हानि को स्वीकार किया जाता है तो बिजली आपूर्ति की कुल लागत और टैरिफ गणना पर इसका प्रभाव पड़ सकता है.
कंपनी ने बताया वास्तविक स्थिति पर आधारित अनुमान
मप्र पावर मैनेजमेंट कंपनी के सीजीएम रेवेन्यू शैलेंद्र सक्सेना के अनुसार मल्टी ईयर टैरिफ व्यवस्था में आयोग पांच साल के लिए हर वर्ष की संभावित वितरण हानि का अनुमान मांगता है. इसी आधार पर कंपनी ने अगले पांच वर्षों का प्रोजेक्शन आयोग को सौंपा है. उनका कहना है कि आंकड़े वास्तविक स्थिति के करीब रखे गए हैं और वितरण हानि कम करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं.
केंद्र सरकार की आरडीएसएस योजना का उद्देश्य भी बिजली वितरण नेटवर्क को मजबूत करना और तकनीकी एवं वाणिज्यिक नुकसान घटाना है. योजना की अवधि बढ़ाकर 31 मार्च 2028 तक कर दी गई है.
20 हजार करोड़ के निवेश के बाद भी सवाल
बिजली मामलों के जानकार और सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य अभियंता राजेंद्र अग्रवाल ने लाइन लॉस के बढ़ते अनुमान पर सवाल उठाए हैं. उनके मुताबिक प्रदेश में बिजली ढांचे को बेहतर बनाने के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत करीब 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का अनुमान है. इसमें स्मार्ट मीटरिंग जैसी परियोजनाएं भी शामिल हैं.
उनका कहना है कि यदि इतने बड़े निवेश के बावजूद वितरण हानि कम नहीं होती और आगे के लिए अधिक नुकसान का स्तर स्वीकार किया जाता है तो इसकी अतिरिक्त लागत का भार भविष्य में बिजली दरों के जरिए उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है.
आपत्तियों के बाद तस्वीर होगी साफ
वितरण हानि सिर्फ तकनीकी नुकसान तक सीमित नहीं होती. लाइन, ट्रांसफार्मर और नेटवर्क से जुड़े नुकसान तकनीकी हानि में आते हैं, जबकि बिजली चोरी, मीटरिंग, बिलिंग और वसूली से जुड़ी कमियां वाणिज्यिक हानि बढ़ाती हैं.
अब 1 सितंबर तक मिलने वाली आपत्तियों और सुझावों पर नजर रहेगी. इसके जरिए यह स्पष्ट हो सकेगा कि 23 और 24.5 प्रतिशत के प्रस्तावित आंकड़ों का आधार क्या है और अगले पांच वर्षों में लाइन लॉस घटाने के लिए क्या योजना बनाई गई है. उपभोक्ताओं पर वास्तविक असर कितना होगा, इसका अंतिम फैसला आयोग के टैरिफ आदेश से ही स्पष्ट होगा.









