भोपाल। मध्य प्रदेश की राज्यसभा राजनीति में बीजेपी के एक फैसले ने सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी है। पार्टी ने तीसरी राज्यसभा सीट के लिए महेश केवट को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को सीधा और रोचक बना दिया है। अब तक आसान माने जा रहे चुनावी समीकरणों में अचानक बदलाव दिखाई देने लगा है।
सोमवार नामांकन दाखिल करने का अंतिम दिन है और बीजेपी के इस फैसले के बाद अब राज्यसभा चुनाव में मतदान होना करीब तय माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को बीजेपी की बड़ी रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है।
बीजेपी ने 6 साल के लिए पार्टी से किया था बहार
महेश केवट का राजनीतिक करियर कई उतार-चढ़ाव से गुजर चुका है। नगरीय निकाय चुनाव के दौरान उन पर पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ काम करने के आरोप लगे थे, जिसके बाद महेश केवट को पार्टी से 6 साल के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था. हालांकि संघ की पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण उन्होंने संगठन के भीतर दोबारा अपनी जगह मजबूत की। अप्रैल में मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष बनने के बाद अब उनका नाम राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में सामने आया है।
बीजेपी ने महेश केवट को क्यों बनाया उम्मीदवार
बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव में महेश केवट को उम्मीदवार बनाकर बड़ा सामाजिक और राजनीतिक दांव खेला है। महेश केवट बुंदेलखंड क्षेत्र में केवट समाज के प्रभावशाली चेहरे माने जाते हैं और उनकी उम्मीदवारी को सिर्फ एक चुनावी फैसला नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। केवट समाज अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के भीतर अति पिछड़े वर्ग में प्रभाव रखता है और बुंदेलखंड समेत कई इलाकों में इसका राजनीतिक असर भी माना जाता है। बीजेपी के इस कदम से पार्टी ने एक तरफ अति पिछड़े वर्ग को मजबूत संदेश देने की कोशिश की है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय संतुलन को भी साधने का प्रयास किया है।
18 जून को हो सकता है मुकाबले का फैसला
अगर नामांकन प्रक्रिया के बाद सभी उम्मीदवारों के पर्चे वैध पाए जाते हैं तो 18 जून को मतदान हो सकता है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव का परिणाम वोटों के गणित पर काफी हद तक निर्भर करेगा। राजनीतिक दलों की नजरें अब विधायकों की एकजुटता और रणनीति पर टिक गई हैं।
बीजेपी के अतिरिक्त वोटों पर टिकी नजर
राज्यसभा चुनाव में बीजेपी अपने दो उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के बाद भी अतिरिक्त वोटों की स्थिति में दिखाई दे रही है। इसी कारण तीसरे उम्मीदवार को उतारने के फैसले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी बिना ठोस गणित और रणनीतिक तैयारी के ऐसा कदम नहीं उठाती। वहीं कांग्रेस को क्रॉस वोटिंग का डर है.
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