MP Rajya Sabha: मध्य प्रदेश में होने जा रहे राज्यसभा चुनाव का रण अब पूरी तरह से शह-मात के खेल में तब्दील हो चुका है। भाजपा द्वारा उतारे गए तीसरे उम्मीदवार महेश केवट और कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन के बीच छिड़ी सियासी जंग के बीच बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे आ गई हैं। बीते सोमवार को निर्मला सप्रे के मुख्यमंत्री निवास पहुंचने के बाद मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने एक बहुत बड़ा दावा ठोक दिया है। विजयवर्गीय ने मीडिया से दो टूक कहा कि, निर्मला सप्रे पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं और इस राज्यसभा चुनाव में वे भाजपा उम्मीदवार का ही समर्थन करेंगी। विजयवर्गीय के इस दावे के बाद कांग्रेस खेमे में बेचैनी बढ़ गई है।
क्यों फंसा निर्मला सप्रे का पेंच?
राज्यसभा चुनाव के नियमों के मुताबिक, मतदान करने के बाद हर विधायक को अपना मतपत्र अपनी ही पार्टी के अधिकृत व्हिप एजेंट को दिखाना अनिवार्य होता है। यदि कोई विधायक अपनी पार्टी के एजेंट को मतपत्र नहीं दिखाता है, तो उसका वोट अमान्य घोषित कर दिया जाता है। निर्मला सप्रे कागजी तौर पर अभी भी कांग्रेस की ही विधायक हैं, इसलिए उन्हें वोट डालने के बाद कांग्रेस के एजेंट को ही अपना मतपत्र दिखाना होगा।
क्या कहते है जानकार?
विधानसभा के कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि वे कांग्रेस एजेंट को बिना दिखाए वोट डालती हैं तो वोट खारिज हो जाएगा। वहीं दूसरी ओर, यदि वे कांग्रेस एजेंट को मतपत्र दिखाकर बीजेपी को वोट दे देती हैं, तो कांग्रेस इस मतपत्र को उनकी सदस्यता खारिज करने के लिए कानूनी प्रमाण के तौर पर कोर्ट या स्पीकर के सामने इस्तेमाल नहीं कर सकती, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार राज्यसभा में दी गई वोटिंग को दल-बदल कानून के तहत आधार नहीं बनाया जा सकता।
सप्रे का पॉलिटिकल टर्निंग पॉइंट
आपको बता दें कि बीना विधायक निर्मला सप्रे का कांग्रेस से शुरू हुआ सफर और भाजपा के मंचों तक पहुंचने की क्रोनोलॉजी बेहद दिलचस्प है। निर्मला सप्रे साल 2023 के विधानसभा चुनाव में सागर जिले की बीना सीट से कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंची थीं। साल 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान निर्मला सप्रे अचानक कांग्रेस के मंचों से गायब हो गईं और मुख्यमंत्री मोहन यादव व भाजपा के बड़े नेताओं के साथ मंच साझा करने लगीं। उन्हें तभी से भाजपा का अघोषित समर्थक माना जाता है, हालांकि उन्होंने विधानसभा की सदस्यता जाने के डर से अब तक कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है।
कांग्रेस की गुहार और दावा
कांग्रेस ने दल-बदल कानून का हवाला देते हुए निर्मला सप्रे की विधानसभा सदस्यता को समाप्त करने की एक याचिका विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष बीते महीनें पहले दायर कर रखी है। इस पर विधानसभा सचिवालय में कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई का दौर जारी है। यही वजह है कि कांग्रेस आज भी सप्रे को अपना ही विधायक मान रही है और उनके वोट पर अपना दावा ठोक रही है।
अंतिम फैसला 18 जून को
कैलाश विजयवर्गीय के इस चौकाने वाले दावे और कांग्रेस की कानूनी घेराबंदी के बीच मध्य प्रदेश की तीसरी राज्यसभा सीट का यह मुकाबला बेहद रोमांचक मोड़ पर आ गया है। बीजेपी महेश केवट को जिताने के लिए निर्मला सप्रे के वोट का मैनेजमेंट किस तरह करते हैं और कांग्रेस मीनाक्षी नटराजन के लिए अपनी इस सीट को कैसे बचा पाती है, इसका फैसला 18 जून को विधानसभा में होने वाली वोटिंग के दौरान ही साफ हो पाएगा।









