सौरभ श्रीवास्तव संवाददाता कटनी
सब-हेडलाइन:
10 साल बाद भी अधूरा काम, घटिया निर्माण से दरक रही नहरें—जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब?
खबर डिजिटल कटनी, --01 मईकटनी जिले में मध्य प्रदेश सरकार की बहुप्रचारित नर्मदा दायीं तट परियोजना अब सवालों के घेरे में है। अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद नहरों की जमीनी हकीकत चौंकाने वाली है। मीडिया सर्वे में सामने आया है कि कई जगहों पर नहरें धंस रही हैं, जिससे पूरे प्रोजेक्ट की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।खबर:कटनी में किसानों को सिंचाई सुविधा देने के उद्देश्य से शुरू की गई नर्मदा दायीं तट परियोजना अब भ्रष्टाचार और लापरवाही का प्रतीक बनती नजर आ रही है। करीब एक दशक से चल रही इस योजना में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता बेहद खराब पाई गई है। कई स्थानों पर नहरें धंस चुकी हैं या दरकने लगी हैं, जिससे करोड़ों नहीं बल्कि अरबों रुपये की परियोजना पर पानी फिरता दिख रहा है।स्थानीय स्तर पर किए गए सर्वे में सामने आया कि निर्माण में मानकों की अनदेखी की गई। घटिया सामग्री और कमजोर निर्माण के चलते नहरें टिक नहीं पा रहीं। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि इस बड़े प्रोजेक्ट में कहीं न कहीं भारी भ्रष्टाचार हुआ है।इधर, कलेक्टर श्री आशीष तिवारी ने समीक्षा बैठक में निर्माण कार्यों की धीमी गति और लापरवाही पर सख्त नाराजगी जताई। स्लीमनाबाद टनल का काम अब भी अधूरा है और बेहद धीमी गति से चल रहा है। रोजाना सिर्फ 3 मीटर खुदाई परियोजना की सुस्ती को उजागर करती है।बहोरीबंद और ढीमरखेड़ा जैसी सिंचाई योजनाओं में भी काम की रफ्तार बेहद धीमी है। कई योजनाएं समयसीमा से पीछे चल रही हैं, जिससे किसानों को मिलने वाला लाभ लगातार टलता जा रहा है।सेतु निर्माण विभाग की लापरवाही भी खुलकर सामने आई, जहां जिम्मेदार अधिकारी बैठक से ही नदारद रहे। इस पर कलेक्टर ने नोटिस जारी करने के निर्देश दिए, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ नोटिस से ही व्यवस्था सुधरेगी?नगर निगम से लेकर लोक निर्माण विभाग तक, लगभग हर विभाग में समन्वय की कमी और काम में ढिलाई साफ नजर आई। बरसात सिर पर है, लेकिन कई सड़कें और निर्माण कार्य अब भी अधूरे पड़े हैं, जिससे आम जनता को भारी परेशानी झेलनी पड़ सकती है।निष्कर्ष:कटनी की नर्मदा दायीं तट परियोजना, जो कभी विकास की उम्मीद थी, अब अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की मिसाल बनती दिख रही है। अगर समय रहते गुणवत्ता और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो यह महत्वाकांक्षी योजना पूरी तरह फेल हो सकती है—और इसका खामियाजा किसानों और आम जनता को भुगतना पड़ेगा।









