भोपाल/खबर डिजिटल/ देशकाल, राजनीति और लेखन से जुड़े पहलुओं के चिंतन पर जारी इकतारा ट्रस्ट के संगमन-27 में देश भर से आए लेखक एवं चिंतकों ने विचार साझा किए। मालवीय नगर स्थित ट्रस्ट के सभागार में आयोजित तीन दिवसीय आयोजन में शनिवार को दूसरे दिन साहित्यकारों एवं चिंतकों ने शिरकत कर की।
कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि गैलिलियो से लेकर आज तक समझदारों को कठघरे खड़ा किया जाता रहा है। लेखक की पॉलिटिक्स अन्याय और शोषण के खिलाफ होना चाहिए। एक व्यक्ति डेलुजन में आ जाए तो पागल और ढेर सारे लोग हों तो उसका परिणाम अलग ही होता है।
श्री शिवमूर्ति ने कहा कि लेखक सत्ता का प्रतिपक्ष है।लेखक भी विरोध का काम करता है। लेकिन वह सुरक्षित जीवन जीता है। उसका असर तभी होता है जब उसका लिखा हुआ लोगों तक पहुंचता है। सक्रिय कार्यकर्ता की श्रेणी लेखक से ऊपर होती है। लेखक का लक्ष्य आम जनता के पक्ष में आवाज उठाते रहना है । लेखक को चाहिए कि वह भय के खिलाफ खड़ा हो, अन्याय के खिलाफ खड़ा हो।
पुरातत्ववेत्ता सीमाद्री ओता ने कहा कि साइंटिफिक तरीके से काम करते हुए भी कई बार जन भावनाओं का ध्यान रखना पड़ता है। पुरातत्व विज्ञान एक मटीरियल साइंस है। एविडेंस के आधार पर ही काम करता है। यदि कोई अधिकारी सरकार में भ्रष्ट नहीं है तो कोई उसका कुछ नहीं कर सकता है। ज्यादा से ज्यादा से उसका ट्रांसफर किया जा सकता है। हर तरह की संस्थाओं की प्रकृति एक जैसी ही होती है।
कहानीकार एवं उपन्यासकार वंदना राग ने कहा कि मुक्तिबोध की कविता की यह पंक्ति ‘ पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है‘ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। इन पंक्तियों को देश विदेश के कवियों ने अपने अपने देशकाल में अलग अलग से तरह कहा भी है और जवाब भी दिया है। यह सवाल सीधे राजनीतिक विचार जानने के विचार से जुड़ा हुआ है। आज सोशल मीडिया के दौर में इसे तुरंत पकड़ लिया जाता है और तुरंत ट्रोल भी करता है या दंड देता है।
व्यक्तिगत अनुभव पर सुश्री राग बोलते हुए कहती हैं कि उनके लिखे एक लेख के जवाब में आई प्रतिक्रिया में कई बातें तो बताने योग्य भी नहीं हैं। विदेशी दौरों में हुई चर्चाओं में अनुभव को बताते हुए उन्होंने सत्ता में काबिज होने वाली ताकतों के प्रति जनता के नजरियों के बारे बताया। तमाम आंदोलनों के पैटर्न पर बोलते हुए उन्होंने हिटलर के उदाहरण के साथ तानाशाही पर अपनी बात विस्तार से कही। लेखन पर बोलते हुए सुश्री राग ने कहा कि लेखक हमेशा इस द्वंद में रहता है कि वह किसके लिए लिखे और क्यों लिखें? मैं अपने सामने होने वाले विध्वंस के विरोध में लिखती हूं और यही मेरी पॉलिटिक्स है।
कवि महेश वर्मा ने हरिशंकर परसाई और विनोद कुमार शुक्ल से जुड़े प्रसंग को उल्लेखित करते हुए बताया कि लेखन से पूर्व विचारधारा को समझना बेहद जरूरी बताया। श्री वर्मा ने कहा कि वक्त के साथ कई परिभाषाएं बदलती गईं और उनके हिसाब से नियमों में भी बदलाव लाकर नियंत्रण किया जाने लगा। डिजिटल दौर में यह डिवाइसेज के जरिए भी हो रहा है। आज व्यक्ति अपने सर्विलांस की स्वयं की अनुमति दे चुका है। साहित्य की मांग पर बोलते हुए कहा कि राजनीतिक और सामाजिक वातावरण से एक दबाव बनता महसूस होता है जो लगभग एक जैसे साहित्य लेखन की मांग करता है।
उर्दू के लेखक एवं कवि खुर्शीद अकरम ने उर्दू में ऐसा ठोस लेखन नहीं हो रहा है जिसमें हमारे समय की राजनीति, बाजारवाद और विचार झलकते हो। साहित्य का संबंध जीवन के लगभग सभी हिस्सों से है। साहित्य की राजनीतिक के दो मूल नजर आते हैं पहली करुणा है और दूसरी क्रोध। इन दोनों के सफर के बीच लेखक की पॉलिटिक्स उत्पन्न होती हैं। लेखक की राजनीति कमजोरों के साथ खड़े होकर मानवताविरोधी सत्ता के खिलाफ लिखने बोलने की हैं।
कवियत्री श्रद्धा थवाईत ने कहा कि प्रश्न भूख की तरह होते हैं। इनकी पूर्ति के लिए तलाश में निकलना पड़ता है। लेखन की प्रक्रिया उलझनों के पहाड़ से उतरती नदी की तरह होती है। कवि बहादुर पटेल ने कहा कि साहित्यिक लेखन में लेखक देशकाल को दर्ज करने के साथ आगामी पीढ़ियों के लिए संदर्भ तैयार कर रहा होता है। उस पर सांस्कृतिक परावर्तन का भार भी होता है। लेखक को यदि उसकी पॉलिटिक्स का एहसास स्पष्ट होगा तो वह इस भार को काफी हद तक कम कर सकता है।
दो सत्रों में आज शामिल होंगे ये चिंतक और लेखक: तीन दिवसीय आयोजन ‘ संगमन- 27’ के तीसरे दिन आयोजन दो सत्रों में किया जाएगा। सत्रों में लाल्टू, लोक बाबू, प्रत्यक्षा, मनोज कुमार पाण्डेय, वैभव सिंह, मिथलेश प्रियदर्शी, विजयश्री तनवीर, पराग मांदले, पराग त्रिपाठी, शंपा शाह, मनीषा पांडेय, चंदन पांडेय, प्रियंवद एवं यशंवत पाराशर आदि कवि एवं लेखक अपने विचार साझा करेंगे।









