आदिवासी इलाके में ऐसे लगता है बारिश का पूर्वानुमान… पटेलिया परम्परा बनी चर्चा का केंद्र

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Khabar Digital Desk

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आदिवासी इलाके में ऐसे लगता है बारिश का पूर्वानुमान… पटेलिया परम्परा बनी चर्चा का केंद्र

आलीराजपुर/कुलदीप खराड़ीया/खबर डिजिटल/ आलीराजपुर जिले के चन्द्र शेखर आजाद नगर (भाबरा) क्षेत्र के रिगोंल गांव में पटेलिया आदिवासी समाज की सदियों पुरानी परम्परा एक बार फिर चर्चा में है। होली के पावन अवसर पर बारिश का पूर्वानुमान लगाने की यह अनूठी 'शकन' विधि आज भी पूरे विश्वास और नियमों के साथ निभाई जाती है। इस परम्परा को गांव के वरिष्ठजन श्री धुला भाई-जवा भाई भूरिया पटेलिया द्वारा विधिवत किया जाता है, जिसे समाज की पीढ़ियां आगे बढ़ा रही हैं।

क्या है बारिश का यह 'शकन' तरीका?
पटेलिया समाज के अनुसार, होली की शाम को पांच महीनों के प्रतीक पांच अलग-अलग रंग के बालोल (बीज) एकत्र किए जाते हैं। इन बीजों की कुल संख्या 10 होती है - दो-दो की जोड़ी में। इन बीजों को एक कोरे लोटे में पानी भरकर डाला जाता है, फिर लोटे को कपड़े से बांधकर मकान की छत पर पूरी रात रखा जाता है। सुबह कपड़ा खोलकर बीजों की स्थिति देखी जाती है। वे कितने फूले, आधे फूले या सूखे रहे. इसी आधार पर आने वाले वर्ष की वर्षा का अनुमान लगाया जाता है।

कैसे समझा जाता है वर्षा का संकेत?
बीजों की स्थिति से बारिश का अनुमान इस प्रकार लगाया जाता है। पूरा फूला हुआ बालोल यानी अच्छी बारिश और भरपूर फसल। आधा फूला हुआ - आधे पखवाड़े में कम वर्षा। सूखा बालोल - सूखा या कम बारिश का संकेत। यहां 'पन्द्रह' (पखवाड़ा) वर्षा के समय को दर्शाता है।

https://khabardigital.com/madhya-pradesh/alirajpur-news-villagers-protest-for-pond-compensation-in-bodgaon/

कौन-कौन से महीनों का मिलता है संकेत?
बीज पांच प्रमुख महीनों का प्रतीक होते हैं।
पहला पन्द्रह - जेठ
दूसरा पन्द्रह - आहड़
तीसरा पन्द्रह - श्रावण
चौथा पन्द्रह - भादरवा
पांचवां पन्द्रह - हाथिया
हर बीज का फूलना या सूखना उस महीने की संभावित वर्षा को दर्शाता है।

परम्परा में छिपा वैज्ञानिक दृष्टिकोण
स्थानीय समाजसेवी और अनुसंधानकर्ता महेश भूरिया (सरपंच, रिगोंल) तथा लेखक-साहित्यकार बी.एल. भूरा के अनुसार, यह परम्परा केवल आस्था नहीं बल्कि प्रकृति के सूक्ष्म संकेतों को समझने की एक पारंपरिक वैज्ञानिक पद्धति है। बीजों का पानी में फूलना वातावरण की नमी, तापमान और वायु की स्थिति से जुड़ा माना जाता है। पीढ़ियों के अनुभव ने इस विधि को विश्वसनीय बनाया है।

प्रकृति से जुड़ी ज्ञान परम्परा
यह परम्परा दर्शाती है कि आदिवासी समाज प्रकृति के कितने निकट है। आधुनिक मौसम विज्ञान जहां उपग्रह और तकनीक का सहारा लेता है, वहीं यह समुदाय सदियों से प्राकृतिक संकेतों के आधार पर वर्षा का अनुमान लगाता आया है। यह ज्ञान न केवल कृषि के लिए उपयोगी रहा है, बल्कि समाज को प्रकृति के साथ संतुलन में जीने की सीख भी देता है।

https://khabardigital.com/madhya-pradesh/indore-bhagirathpura-contaminated-water-protest/
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