केवलारी/उगली। सिवनी से संतोष वन्देवार की रिपोर्ट - प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, खनिज संपदा के संरक्षण और शासन के राजस्व की रक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यदि नालों से बड़े पैमाने पर रेत का अवैध उत्खनन और परिवहन होने की शिकायतें सामने आती हैं, तो प्रशासन की कार्रवाई केवल रेत के छोटे-छोटे डंप तक सीमित क्यों रह जाती है? शिकायत के लगभग दस दिन बाद राजस्व एवं खनिज विभाग की संयुक्त टीम द्वारा जांच शुरू किए जाने के बाद अब ऐसे ही सवाल क्षेत्र में चर्चा का विषय बने हुए हैं।
उगली क्षेत्र में कथित रेत चोरी और प्राकृतिक संसाधनों को हुए नुकसान को लेकर शिकायतकर्ता एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े स्वप्निल उपाध्याय ने जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि प्रशासन वास्तव में गंभीर है, तो जांच केवल मौके पर मिले रेत के डंप तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उगली क्षेत्र के समस्त नालों का भौतिक निरीक्षण, रेत के अवैध उत्खनन की वास्तविक मात्रा का आकलन, शासन को हुए संभावित राजस्व नुकसान की गणना और जिम्मेदार व्यक्तियों के साथ संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की जांच भी होनी चाहिए।
डंप तो मिले, लेकिन मालिक सामने नहीं आया—फिर जवाबदेही किसकी?
प्रारंभिक जांच के दौरान एसडीएम केवलारी के कथन के संबंध में शिकायतकर्ता ने बताया कि रेत के डंप तो मिले हैं, लेकिन कोई व्यक्ति उनकी जिम्मेदारी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। ऐसे में कार्रवाई किसके विरुद्ध की जाए, यह प्रश्न सामने आया।
हालांकि, किसी व्यक्ति द्वारा डंप का स्वामित्व स्वीकार नहीं करने से जांच की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। प्रशासन के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि रेत कहां से लाई गई, किसने उसका उत्खनन या परिवहन किया, डंप किस उद्देश्य से बनाए गए और इसके पीछे किन व्यक्तियों अथवा एजेंसियों की भूमिका रही है।
सवाल यह है कि जब रेत मौके पर मिली है, तो उसके स्रोत, परिवहन, भंडारण और संबंधित व्यक्तियों की पहचान के लिए क्या जांच की गई?
नालों में वापस रेत डालना समाधान नहीं, लेकिन नुकसान का आकलन कौन करेगा?
शिकायतकर्ता के अनुसार, एसडीएम केवलारी की ओर से यह बात भी कही गई कि नालों से जो रेत पहले ही निकाली जा चुकी है, उसकी भरपाई केवल दोबारा रेत डालकर नहीं की जा सकती।
यह बात पर्यावरणीय क्षति की गंभीरता को सामने लाती है। लेकिन इसके साथ एक दूसरा सवाल भी खड़ा होता है—यदि प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचा है, तो उस नुकसान का आकलन कौन करेगा और उसकी जवाबदेही किस पर तय होगी?
रेत की वास्तविक मात्रा, नालों की वर्तमान स्थिति, पूर्व स्थिति से हुए बदलाव, जलप्रवाह पर संभावित प्रभाव और राजस्व की संभावित हानि का आकलन किए बिना जांच कितनी पूर्ण मानी जा सकती है?
स्वप्निल उपाध्याय का कहना है कि नालों का भौतिक सत्यापन किए बिना और कथित अवैध उत्खनन की मात्रा का आकलन किए बिना केवल डंप पर कार्रवाई करना व्यापक जांच का विकल्प नहीं हो सकता।
खनिज निरीक्षक और खनिज अधिकारी की भूमिका पर सवाल
रेत चोरी की शिकायतों और मीडिया में लगातार सामने आ रही खबरों के बाद ही कार्रवाई की प्रक्रिया तेज होने के सवाल ने खनिज विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं।
यदि क्षेत्र में लंबे समय से अवैध उत्खनन, परिवहन या भंडारण हो रहा था, तो उसकी रोकथाम के लिए नियमित निरीक्षण और निगरानी की क्या व्यवस्था थी? संबंधित क्षेत्र में खनिज निरीक्षक एवं खनिज अधिकारी द्वारा पूर्व में क्या कार्रवाई की गई? शिकायत मिलने से पहले कितने निरीक्षण हुए और कितने प्रकरण दर्ज किए गए?
इन सवालों का जवाब विभागीय अभिलेखों, निरीक्षण प्रतिवेदनों और कार्रवाई के दस्तावेजों से सामने आना चाहिए। साथ ही, यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही प्रमाणित होने पर उसके विरुद्ध नियमानुसार क्या कार्रवाई की जाएगी।
मीडिया रिपोर्ट और शिकायत के बाद कार्रवाई होना अपने आप में मिलीभगत का प्रमाण नहीं है, लेकिन इससे पहले की निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता जरूर पैदा होती है।
आखिर कितनी रेत चोरी हुई और शासन को कितना नुकसान पहुंचा?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल कथित रेत चोरी की वास्तविक मात्रा और उससे शासन को हुए संभावित आर्थिक नुकसान का है।
उगली क्षेत्र के नालों से कितनी रेत निकाली गई? यह गतिविधि कितने समय से चल रही थी? क्या संबंधित स्थानों पर वैध अनुमति थी? कितनी मात्रा में रेत का अवैध परिवहन या भंडारण हुआ? खनिज नियमों के तहत कितना राजस्व, रॉयल्टी, जुर्माना या अन्य देय राशि बनती है? क्या प्राकृतिक संसाधनों को हुए नुकसान का अलग से आकलन आवश्यक है?
इन प्रश्नों के उत्तर केवल अनुमान से नहीं, बल्कि स्थल निरीक्षण, उपलब्ध राजस्व एवं खनिज अभिलेखों, माप-जोख, संबंधित अनुमतियों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर सामने आने चाहिए।
स्वप्निल उपाध्याय ने मांग की है कि जांच में केवल वर्तमान में मिले डंप की मात्रा दर्ज न की जाए, बल्कि उन नालों की स्थिति भी दर्ज हो जहां से कथित तौर पर रेत निकाली गई है। इससे वास्तविक स्थिति और प्रशासनिक कार्रवाई के दायरे का पता चल सकेगा।
पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई अब NGT तक ले जाने की तैयारी
शिकायतकर्ता स्वप्निल उपाध्याय ने जांच को सीमित और औपचारिक बताते हुए कहा है कि यदि उगली क्षेत्र के सभी प्रभावित नालों का निष्पक्ष भौतिक निरीक्षण, कथित अवैध उत्खनन की मात्रा का आकलन, राजस्व नुकसान की गणना और जिम्मेदार लोगों की भूमिका की जांच नहीं की जाती, तो वे पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के समक्ष उचित आवेदन प्रस्तुत करने की तैयारी करेंगे।
उनकी प्रमुख मांगों में समस्त संबंधित नालों का स्थल निरीक्षण, उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर पूर्व और वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक आकलन, अवैध उत्खनन की मात्रा का निर्धारण, शासन को हुए नुकसान की गणना तथा संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच शामिल है।
उन्होंने यह भी मांग की है कि शिकायतकर्ता की उपस्थिति में आवश्यक स्थलों का निरीक्षण कर पंचनामा तैयार किया जाए, ताकि जांच की प्रक्रिया पारदर्शी रहे और वास्तविक स्थिति अभिलेखों में दर्ज हो सके।
प्रशासन के सामने अब जवाबदेही की परीक्षा
रेत के डंप पर कार्रवाई करना तत्कालीन स्थिति में आवश्यक कदम हो सकता है, लेकिन क्या इससे नालों से कथित तौर पर निकाली गई रेत, प्राकृतिक संसाधनों को हुए नुकसान और शासन के संभावित राजस्व घाटे से जुड़े सभी सवालों का उत्तर मिल जाता है?
प्रशासन के सामने अब चुनौती है कि वह जांच का दायरा स्पष्ट करे, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर वास्तविक स्थिति सामने लाए और जहां भी नियमों का उल्लंघन या लापरवाही प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करे।
अब देखना यह है कि जांच केवल रेत के डंप तक सीमित रहती है या उगली के नालों से लेकर राजस्व अभिलेखों तक पूरी कड़ी की पड़ताल होती है। पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और शासन के राजस्व की जवाबदेही—तीनों सवालों पर प्रशासन को तथ्यात्मक जवाब देना होगा।









