MP Nigam Mandal: मध्य प्रदेश की राजनीति में सात साल पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ में इस समय नई सियासी सुगबुगाहट चल रही है। राज्य के कई निगमों, मंडलों और प्राधिकरणों में हाल ही में हुए विस्तार के बाद ग्वालियर-चंबल अंचल से लेकर भोपाल और दिल्ली के गलियारों तक चर्चाएं गर्म हैं। माना जा रहा है कि इन नियुक्तियों के जरिए भाजपा संगठन ने राज्य में गुटबाजी और खेमेबाजी को पूरी तरह समाप्त करने का एक बड़ा और कड़ा संदेश दिया है।
सिंधिया खेमे को मिले सिर्फ दो नाम
राजनीतिक गलियारों में इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा है कि राज्य की 65 नियुक्तियों में सिंधिया समर्थकों को वह तवज्जो नहीं मिली, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। पूरी सूची में सिंधिया खेमे से केवल दो चेहरों को जगह मिल सकी है। इसमें सुधीर गुप्ता को ग्वालियर विकास प्राधिकरण का उपाध्यक्ष और अशोक शर्मा को ग्वालियर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है। सिंधिया के सबसे खास और पूर्व मंत्रियों, नेताओं जैसे इमरती देवी, मुन्ना लाल गोयल, महेंद्र सिंह सिसोदिया, ओपीएस भदौरिया और गिर्राज दंडोतिया को इस सूची में शामिल नहीं किया गया है।
पार्टी का साफ विजन
सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री मोहन यादव और भाजपा संगठन अब राज्य में किसी भी तरह के कोटेबाजी को बढ़ावा देने के मूड में नहीं हैं। इन नियुक्तियों से यह साफ कर दिया गया है कि सत्ता और संगठन में भागीदारी का एकमात्र आधार अब व्यक्तिगत पैरवी या गुट विशेष का ठप्पा नहीं होगा, बल्कि पार्टी के प्रति निष्ठा ही तय करेगी कि किसे क्या जिम्मेदारी मिलेगी। यह बदलाव केवल निगम-मंडलों में ही नहीं, बल्कि कैबिनेट में भी साफ दिखता है, जहां सिंधिया के केवल तीन विश्वसनीय चेहरे तुलसी सिलावट, गोविंद सिंह राजपूत और प्रद्युम्न सिंह तोमर ही शामिल हैं।
दिल्ली दरबार पहुंचे महाराज
समर्थकों की इस अनदेखी के बीच ज्योतिरादित्य सिंधिया की नाराजगी की खबरें भी सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि अपनी बात रखने के लिए सिंधिया ने दिल्ली का रुख किया है, जहां उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों से मुलाकात की है।
बचे हुए पदों पर लगी रोक!
सिंधिया की दिल्ली में सक्रियता और आलाकमान तक अपनी बात पहुंचाने के बाद राज्य सरकार ने बाकी बचे हुए निगम-मंडलों और प्राधिकरणों की नियुक्तियों पर फिलहाल अस्थायी रोक लगा दी है। सिंधिया अब बचे हुए पदों पर अपने समर्थकों को एडजस्ट कराने के लिए पूरी राजनीतिक ताकत झोंक रहे हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली दरबार की इस दौड़ के बाद महाराज अपने वफादारों को सत्ता में हिस्सेदारी दिला पाते हैं या संगठन अपने नो-कोटा नीति पर अडिग रहता है।









