भोपाल/खबर डिजिटल/ मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की वापसी को लेकर चर्चाएं तेज हैं। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या शिवराज सिंह चौहान को एक बार फिर मध्यप्रदेश की कमान सौंपी जानी चाहिए। हालांकि भाजपा की ओर से नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है, लेकिन हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने शिवराज की स्वीकार्यता और उनके पुराने राजनीतिक प्रभाव को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
प्रदेश की तासीर के अनुसार चर्चा
दरअसल, यह मांग केवल शिवराज समर्थकों की भावनात्मक अपील भर नहीं मानी जा रही। इसके पीछे प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां, किसानों की नाराजगी, दतिया उपचुनाव के बाद उठे सवाल और शिवराज सिंह चौहान की जनसंपर्क क्षमता जैसे कई कारण जुड़े हुए हैं। इसी तरह से प्रशासनिक पकड़ और लाड़ली बहनाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। इससे माना जा रहा है कि आने वाले वक्त में राज्य या फिर केंद्र में शिवराज सिंह चौहान बड़ी जिम्मेदारी के साथ नजर आएंगें।
मूंग खरीद आंदोलन ने बढ़ाई राजनीतिक चर्चा
मध्यप्रदेश में हाल ही में मूंग की MSP पर खरीद को लेकर बड़ा किसान आंदोलन देखने को मिला। हजारों किसान भोपाल पहुंचे और प्रदर्शन के दौरान सरकार पर दबाव बढ़ा। आंदोलन के बाद सरकार को खरीद की सीमा बढ़ाने और खाद वितरण से जुड़े ई-टोकन सिस्टम पर पुनर्विचार जैसे कदम उठाने पड़े। इस पूरे घटनाक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता और उनकी किसानों से संवाद करने की शैली ने एक बार फिर उन्हें प्रदेश की राजनीति के केंद्र में ला दिया।
मूंग खरीदी के लिए शिवराज का पुराना फॉर्मूला
प्रदेशभर के मूंग किसानों को पूर्व सीएम और वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अलग ही फॉर्मूला निकाला था, उन्होंने किसानों से मूंग खरीदकर प्रदेश की नन्हीं-नन्हीं स्कूली बच्चियों को 10-10 किलो प्रति बच्ची के हिसाब से मूंग की दाल का वितरण किया था। उनके फॉर्मूले ने किसानों को राहत देने के साथ बच्चियों को पोषण आहार उपलब्ध कराने का भी काम किया। जिसकी तारीफ बच्चियों के परिजनों ने खूब जी-भरकर की थी।
किसान वाली छवि भी महत्वपूर्ण
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, किसान आंदोलन ने यह संदेश भी दिया कि शिवराज आज भी मध्यप्रदेश के ग्रामीण और किसान वर्ग के बीच एक मजबूत राजनीतिक पकड़ रखते हैं। यही कारण है कि उनके समर्थक इस मुद्दे को शिवराज मॉडल की तुलना में भी देखने लगे हैं, जोकि खुद एक किसान पुत्र के रुप में जाने जाते हैं। उनकी इसी छवि के कारण आज वो केंद्रीय कृषि मंत्री के पद पर काबिज है, और वहां भी अपनी छटा बिखेरते नजर आ रहे हैं, जिसकी तस्वीर संसद भवन से साफ तौर पर दिख जाती है।
दतिया उपचुनाव के बाद बढ़े सवाल
दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को झटका लगने के बाद पार्टी के संगठन और सरकार की राजनीतिक रणनीति पर चर्चा शुरू हुई। इसी दौरान संघ से जुड़े कुछ प्रमुख विचारकों ने भी सार्वजनिक रूप से शिवराज सिंह चौहान की राजनीतिक क्षमता, संवाद शैली और सहमति बनाने की उनकी योग्यता की सराहना की। इसके बाद यह बहस और तेज हो गई कि भाजपा को मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की राजनीतिक क्षमताओं का किस तरह इस्तेमाल करना चाहिए।यही घटनाक्रम शिवराज को दोबारा मुख्यमंत्री बनाने की मांग करने वाले समर्थकों के लिए एक बड़ा राजनीतिक आधार बन गया।
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'मामा' के रुप में शिवराज की जनस्वीकार्यता
शिवराज सिंह चौहान करीब 18 वर्षों तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और प्रदेश के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल हैं। उनकी पहचान केवल भाजपा नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में बनी जिसने गांव, किसान, महिलाओं और गरीब वर्ग के बीच सीधा राजनीतिक संवाद कायम किया। लाड़ली बहना योजना समेत महिलाओं और गरीब परिवारों से जुड़ी योजनाओं का राजनीतिक प्रभाव भी आज तक मध्यप्रदेश की राजनीति में दिखाई देता है। उनकी 'मामा' वाली छवि जनता से भुलाई नहीं जा रही है। जिसके वीडियो समय-समय पर वायरल हो रहे हैं, जहां बच्चे कहते दिखाई दे रहे हैं 'मामा' आ जाओ।
संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय की उम्मीद
शिवराज समर्थकों का तर्क है कि लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के कारण उन्हें प्रशासन, संगठन और सत्ता के बीच संतुलन बनाने का व्यापक अनुभव है। भाजपा के भीतर विभिन्न नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ उनकी संवाद शैली को भी उनकी राजनीतिक ताकत माना जाता है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच यह तर्क दिया जा रहा है कि शिवराज सिंह चौहान की वापसी से संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बन सकता है।
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वरिष्ठों से समन्वय का अलग उदाहरण
प्रदेश की हालिया सियासत में देखा जा रहा है कि वरिष्ठ मंत्री खुलेआम बगावत करते नजर आ रहे हैं, जबकि शिवराज काल में इस तरह का काम ही देखने को मिला था। उनके समय वरिष्ठों का सम्मान अलग तरह से किया जाता था, जिसके चलते वे मुखर होने के बावजूद शिवराज की तारीफ करते नहीं थकते थे। जिसके उदाहरण के रुप में पूर्व सीएम उमा भारती सबसे बड़ा नाम हैं, जिन्होंने शराबबंदी की अपील करने के बावजूद शिवराज की आलोचना नहीं की थी।
केंद्र में मंत्री, लेकिन नजर अब भी मध्यप्रदेश पर
वर्तमान में शिवराज सिंह चौहान केंद्र सरकार में कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे हैं। इसके बावजूद मध्यप्रदेश से जुड़े कार्यक्रमों और किसान हितों के मुद्दों पर उनकी सक्रियता लगातार बनी हुई है। मई 2026 में भैरूंदा में ग्रामीण विकास और सड़क परियोजनाओं से जुड़े बड़े कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी और मध्यप्रदेश के लिए विभिन्न परियोजनाओं की घोषणाओं ने भी प्रदेश की राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका को रेखांकित किया था। यही वजह है कि उनके समर्थकों का मानना है कि दिल्ली में केंद्रीय मंत्री की भूमिका निभाने के बावजूद शिवराज सिंह चौहान का राजनीतिक आधार और प्रभाव मध्यप्रदेश में कम नहीं हुआ है।
क्या सचमुच हो सकती है शिवराज की वापसी?
फिलहाल इस सवाल का जवाब पूरी तरह राजनीतिक अटकलों के दायरे में है। मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव भाजपा के निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं और पार्टी नेतृत्व की ओर से उन्हें बदलने को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। लेकिन मूंग खरीद विवाद, किसानों के आंदोलन, उपचुनाव के बाद संगठन पर उठे सवाल और शिवराज सिंह चौहान की लगातार बनी जनस्वीकार्यता ने एक बात जरूर स्पष्ट कर दी है कि मध्यप्रदेश की राजनीति में 'मामा' का राजनीतिक अध्याय खत्म नहीं हुआ है।
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