डिंडोरी /खबर डिजिटल /शैलेश नामदेव/ डिंडोरी के शिकारी टोला गांव के आदिवासियों ने पेश की जनसहयोग की वो मिसाल, जिसने प्रशासनिक सुस्ती के मुंह पर तमाचा जड़ दिया है। कहते हैं कि अगर इरादों में दम हो, तो पहाड़ों का सीना चीरकर भी रास्ता बनाया जा सकता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के समनापुर विकासखंड के अंतर्गत आने वाले एक छोटे से आदिवासी बाहुल्य गांव 'शिकारी टोला' के ग्रामीणों ने। जहाँ महीनों और सालों से जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग बजट का रोना रोकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहा था, वहीं इस गांव के 100 गरीब परिवारों ने अपनी फटेहाली को भुलाकर अपने बच्चों के भविष्य के लिए खुद ही प्राथमिक शाला भवन का निर्माण शुरू कर दिया है।
यह कहानी केवल एक स्कूल की चारदीवारी खड़ी करने की नहीं है, बल्कि यह कहानी है व्यवस्था की बेरुखी के खिलाफ एक पूरे गांव के स्वाभिमान और अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति उनके अटूट संकल्प की।
शिकारी टोला का यह प्राथमिक शाला भवन पिछले तीन साल से जर्जर हालत में था। स्कूल की दीवारों में आई दरारें और टपकती छत यहाँ पढ़ने वाले 52 मासूम बच्चों की जिंदगी पर हर वक्त मंडराते खतरे की गवाही दे रही थीं। स्कूल की शिक्षिका रजनी मसराम बताती हैं कि भवन की बदहाली को देखते हुए ग्रामीणों ने पहले पास में ही एक कच्ची झोपड़ी बनाई और वहां जैसे-तैसे स्कूल का संचालन शुरू किया।
ग्रामीणों ने नए भवन के लिए अधिकारियों की चौखट से लेकर जनप्रतिनिधियों के घरों तक के चक्कर काटे, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ खोखले आश्वासन मिले। हद तो तब हो गई जब समनापुर के बीआरसी ने एक फरमान जारी कर इस स्कूल को तीन किलोमीटर दूर भालपुरी मिडिल स्कूल में स्थानांतरित करने का आदेश दे दिया और प्रशासन ने पुराने जर्जर भवन को जमींदोज कर दिया।
"हम अपने मासूम बच्चों को तीन किलोमीटर दूर घने जंगलों और रास्तों के हवाले कैसे कर दें? कल को कोई अनहोनी हो गई, तो क्या ये साहब लोग जिम्मेदारी लेंगे?" यह दर्द और गुस्सा है पालक शिक्षक संघ के अध्यक्ष रूपदास का, जिन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर इस स्थानांतरण का विरोध किया। जब प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए, तो ग्रामीणों ने तय किया कि वे अपने बच्चों को दूर नहीं भेजेंगे, बल्कि अपने गांव में खुद नया स्कूल बनाएंगे।
केवल 100 घरों की आबादी वाले इस आदिवासी गांव के लिए स्कूल बनाना कोई आसान काम नहीं था। गांव के अधिकांश लोग रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाले मजदूर हैं। लेकिन जब बच्चों के भविष्य की बात आई, तो हर घर से मदद के हाथ आगे बढ़े।
गांव की पंचायत बैठी और तय हुआ कि हर परिवार अपनी क्षमता के अनुसार 500 रू का चंदा देगा।
जिन अत्यंत गरीब परिवारों के पास नकद 500रू देने की हैसियत नहीं थी, उन्होंने पीछे हटने के बजाय कहा, 'हमारे पास पैसा नहीं है, तो क्या हुआ? हमारे हाथों में ताकत है।' वे परिवार दिन-रात स्कूल निर्माण में मजदूरी कर रहे हैं।
गांव की एक कर्मठ महिला शकुंतला बाई, जो खुद इस चिलचिलाती धूप में ईंट-गारा ढो रही हैं, रुंधे गले से कहती हैं, "इस स्कूल में हमारे ही कलेजे के टुकड़े पढ़ते हैं। सरकार नया भवन नहीं बनवा रही, तो क्या हम अपने बच्चों को अनपढ़ छोड़ दें? हम पेट काटकर, चंदा जोड़कर और खुद पसीना बहाकर यह भवन खड़ा कर रहे हैं। हमें किसी साहब की दया नहीं चाहिए।"
वर्तमान में ये 52 बच्चे मंगवार गांव के एक शिक्षक फूल सिंह के निजी घर में बैठकर पढाई कर रहे हैं। इधर, ग्रामीणों की मेहनत से स्कूल की दीवारें अब दरवाजे के स्तर तक पहुंच चुकी हैं। हालांकि, गांव वालों के पास अब इतना पैसा नहीं बचा है कि वे कंक्रीट की पक्की छत डाल सकें।
लेकिन शिकारी टोला ने हार मानना नहीं सीखा है। ग्रामीणों ने अब यह फैसला किया है कि वे छत पर कंक्रीट की जगह सीमेंट की चादरें डालेंगे, ताकि मानसून आने से पहले उनके बच्चों के सिर पर एक महफूज छत हो और उनकी पढ़ाई बिना किसी बाधा के शुरू हो सके ।
एक तरफ जहां पूरा गांव मिसाल बन चुका है, वहीं प्रशासनिक अधिकारी अभी भी कागजी कार्यवाहियों का ढोल पीट रहे हैं। इस पूरे मामले पर जिला परियोजना समन्वयक दिवाकर तिवारी का एक घिसा-पिटा बयान सामने आया है। उन्होंने कहा, "हमने जिले के सभी जर्जर और मरम्मत योग्य स्कूलों की सूची राज्य शिक्षा केंद्र को पहले ही भेज दी है। जैसे ही वहां से बजट का आवंटन प्राप्त होगा, निर्माण और मरम्मत का काम शुरू कर दिया जाएगा। वैसे, ग्रामीणों की यह पहल सराहनीय है।"
अधिकारियों के लिए यह सिर्फ एक "सराहनीय पहल" हो सकती है, लेकिन शिकारी टोला के आदिवासियों के लिए यह उनके बच्चों के अस्तित्व की लड़ाई है।
शिकारी टोला गांव के इस आत्मसम्मान ने आज डिजिटल इंडिया और शिक्षा के अधिकार के बड़े-बड़े दावों की कलई खोलकर रख दी है। सवाल यह उठता है कि जिस देश में करोड़ों रुपये विज्ञापनों और सरकारी आयोजनों पर पानी की तरह बहा दिए जाते हैं, वहां 52 आदिवासी बच्चों के भविष्य के लिए एक लेंटर डालने का बजट आखिर किस सरकारी फाइल में दम तोड़ रहा है? ग्रामीणों ने अपना फर्ज निभा दिया है, अब देखना यह है कि इस 'सराहनीय पहल' की पीठ थपथपाने वाले हुक्मरानों की गैरत कब जागती है!









