लखनऊ/खबर डिजिटल/ उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद चुनाव की तैयारियों और समय सीमा को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि निर्धारित समय में चुनाव की प्रक्रिया पूरी करना सरकार और प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती हो सकता है। ऐसे में यह भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि राज्य सरकार हाईकोर्ट के आदेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है। हालांकि, इस संबंध में सरकार के अगले कदम पर सबकी नजर है। पंचायत चुनाव की प्रक्रिया में पिछड़ा वर्ग आरक्षण, मतदाता सूची, प्रशासनिक व्यवस्थाओं और कर्मचारियों की तैनाती जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं। इसके अलावा जनगणना और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के चलते भी सरकारी मशीनरी पर काम का दबाव बढ़ने की संभावना है।
प्रशासकों के भरोसे चल रहा पंचायतों का कामकाज
उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 25 मई को समाप्त हो गया था। इसके बाद गांवों में प्रशासनिक और विकास कार्यों को जारी रखने के लिए निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक की जिम्मेदारी दी गई। वहीं, जुलाई में ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल पूरा होने के बाद इन पदों पर भी प्रशासकों के माध्यम से कामकाज संभाला जाने लगा। दूसरी तरफ, राज्य निर्वाचन आयोग पंचायत चुनाव की तैयारियों में जुटा है। आयोग की ओर से 10 जून को मतदाता सूची जारी की जा चुकी है। अब चुनाव कराने के लिए आरक्षण निर्धारण सहित अन्य जरूरी प्रक्रियाओं को पूरा करना महत्वपूर्ण होगा।
OBC आरक्षण के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट अहम
पंचायत चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को आरक्षण देने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 20 मई को समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था। आयोग को आरक्षण से संबंधित पहलुओं का अध्ययन करने और जरूरी प्रक्रिया पूरी करने की जिम्मेदारी दी गई है। आयोग का छह महीने का कार्यकाल 20 नवंबर को समाप्त होना है। ऐसे में उसकी रिपोर्ट चुनाव की आगे की प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही चुनाव से जुड़ी कई औपचारिकताओं को आगे बढ़ाया जा सकेगा। यही वजह है कि आयोग की रिपोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देशों के बीच तालमेल बैठाना सरकार के लिए अहम होगा।
जनगणना और विधानसभा चुनाव की तैयारियां बढ़ाएंगी दबाव
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के साथ प्रशासन के सामने दूसरी बड़ी जिम्मेदारियां भी हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जनगणना का दूसरा चरण 1 दिसंबर 2026 से 4 जनवरी के बीच प्रस्तावित है। इस काम में बड़ी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जा सकती है। इसके अलावा आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के चलते भी प्रशासनिक अमले की व्यस्तता बढ़ने की संभावना है। ऐसी परिस्थितियों में पंचायत चुनाव के लिए पर्याप्त कर्मचारियों की व्यवस्था करना, आरक्षण प्रक्रिया पूरी करना और अन्य चुनावी तैयारियों को निर्धारित समय में पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसी वजह से सरकार के संभावित कानूनी कदम को लेकर चर्चाएं हो रही हैं।
हाईकोर्ट ने तीन महीने के भीतर चुनाव कराने का दिया निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को पंचायत चुनाव से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि नए चुनाव संपन्न होने तक निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के तौर पर काम करते रहेंगे। यह फैसला न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सुनाया। प्रयागराज के इम्तियाज हुसैन और अन्य याचिकाकर्ताओं ने समय पर पंचायत चुनाव कराने की मांग को लेकर अदालत में याचिका दाखिल की थी। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब सरकार के सामने निर्धारित समयसीमा में चुनाव की प्रक्रिया पूरी करने का सवाल है। साथ ही, यह भी देखना होगा कि आरक्षण और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को कितनी तेजी से पूरा किया जा सकता है।
ओम प्रकाश राजभर बोले- आदेश पढ़ने के बाद होगा फैसला
पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने हाईकोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार न्यायपालिका का सम्मान करती है और अदालत के आदेश का पालन करना सभी का दायित्व है। उन्होंने कहा कि अभी उन्होंने आदेश का विस्तार से अध्ययन नहीं किया है, इसलिए इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। राजभर के मुताबिक, पंचायत चुनाव से जुड़े सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। आदेश की पूरी जानकारी मिलने और उसके निर्देशों को समझने के बाद ही सरकार आगे की कार्रवाई को लेकर निर्णय लेगी। उनके बयान के बाद अब सरकार के अगले कदम को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है।
42 जिलों का दौरा कर चुका है पिछड़ा वर्ग आयोग
समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष राम औतार सिंह ने बताया कि आयोग अब तक प्रदेश के 42 जिलों का दौरा कर चुका है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश की प्रति का अध्ययन करने के बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी। यदि आयोग को रिपोर्ट जल्द तैयार करने के निर्देश मिलते हैं, तो सदस्य दो या तीन टीमें बनाकर शेष जिलों का दौरा कर सकते हैं। आयोग की रिपोर्ट, आरक्षण निर्धारण और सरकार के फैसले पर पंचायत चुनाव की आगे की प्रक्रिया निर्भर करेगी। फिलहाल उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव को लेकर तीन अहम सवाल हैं: क्या सरकार हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी, क्या पिछड़ा वर्ग आयोग समय पर अपनी रिपोर्ट सौंप पाएगा और क्या निर्धारित तीन महीने के भीतर चुनाव कराना संभव होगा? इन सवालों के जवाब से ही चुनाव की अगली तस्वीर स्पष्ट होगी।







