KamalNath: मध्य प्रदेश की तीन सीटों पर होने जा रहे राज्यसभा चुनाव ने कांग्रेस के अंदर की अंदरूनी खींचतान को एक बार फिर चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। दिल्ली आलाकमान द्वारा मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद पार्टी में असंतोष का ज्वालामुखी फूट पड़ा है। एक तरफ जहां संगठन के नेता एकजुटता का दिखावा कर रहे है, वहीं दूसरी तरफ बड़े चेहरों की खामोशी और जमीनी नेताओं के सोशल मीडिया पर बयानों ने चुनाव से ठीक पहले क्रॉस वोटिंग के जिन्न को दोबारा जगा दिया है।
नाथ के मौन ने बढ़ाया सस्पेंस
मीनाक्षी नटराजन के नाम पर मुहर लगने के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने उन्हें बधाई देते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी में सब कुछ ठीक है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, इस रेस में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम भी काफी चर्चा में था, लेकिन आलाकमान ने उन्हें तरजीह नहीं दी। टिकट कटने के बाद से अब तक कमलनाथ की ओर से न तो कोई ट्वीट आया है और न ही कोई सार्वजनिक बयान, जिसने प्रदेश से लेकर दिल्ली तक कयासों के बाजार को गर्म कर दिया है।
ज्ञानचंदानी के पोस्ट से मचा बवाल
विवाद उस समय पूरी तरह से सार्वजनिक हो गया जब भोपाल के कद्दावर और वरिष्ठ कांग्रेस नेता नरेश ज्ञानचंदानी ने उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया पर सीधे उंगली उठा दी। ज्ञानचंदानी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल से एक पोस्ट शेयर करते हुए साफ संकेत दिए कि पार्टी हाईकमान को इस सीट पर फैसला लेने से पहले जमीनी नब्ज टटोलनी चाहिए थी। उन्होंने आगाह किया कि राज्यसभा चुनाव के मौजूदा गणित को देखते हुए कांग्रेस के अंदर क्रॉस वोटिंग के खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके इस बयान ने बीजेपी को भी बैठे-बिठाए कांग्रेस पर हमला करने का बड़ा मौका दे दिया है।
विधायक दल की बैठक में तय होगा भविष्य
दिग्विजय सिंह के इस बार चुनाव न लड़ने के फैसले के बाद से ही इस इकलौती सुरक्षित सीट के लिए कांग्रेस के कई दिग्गजों ने दिल्ली में लॉबिंग शुरू कर दी थी। लेकिन नटराजन के नाम के बाद अब पूरी नजरें शनिवार शाम होने वाली कांग्रेस विधायक दल की बैठक पर टिक गई हैं।
क्या है बैठक का एजेंडा?
राजनैतिक जानकारों का मानना है कि यह बैठक महज एक औपचारिक डिनर या बैठक नहीं है, बल्कि यह जीतू पटवारी और उमंग सिंघार के नेतृत्व की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। बैठक का फोकस असंतुष्ट विधायकों को मनाना, कमलनाथ गुट के माननीय सदस्यों को भरोसे में लेना और किसी भी संभावित क्रॉस वोटिंग को रोकने के लिए व्हिप और कड़े दिशा-निर्देशों की रणनीति तैयार करना है। संख्या बल के हिसाब से भले ही कांग्रेस के पास अपनी एक सीट जीतने के लिए 64 विधायक मौजूद हैं, लेकिन भीतरघात की आशंका ने शीर्ष नेतृत्व की धड़कनें बढ़ा दी हैं।









